पिथौरागढ़। धरती पर पाई जाने वाली जड़, पत्ती और शाखा रहित वनस्पति लाइकेन जो डायनासोर (जुरासिक एज) के समय से मौजूद है जिसकी मदद से लाखों-करोड़ों साल पुरानी चट्टानों की आयु का पता लगाया जाता है। यह वनस्पति हवा एवं नमी सीधे वायुमंडल से लेती है और पराबैगनी किरणों से भी बचाव करने में सक्षम है। धरती पर प्रदूषण के संकेतक (इंडिकेटर) के रूप में काम करती है। इससे दवाएं, खुशबूदार मसाले और इत्र तैयार किया जाता है। बावजूद इसके इसे सबसे उपेक्षित छोड़ दिया गया।
लाइकेन की खूबियों से बहुत कम लोग परिचित हैं। वन विभाग ने लाइकेन की खूबियों की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए मुनस्यारी में ऐसा पार्क विकसित किया है जिसमें 120 प्रजातियां एक ही स्थान पर एक साथ नजर आती हैं। लाइकेन की इतनी प्रजातियों वाला यह विश्व का पहला लाइकेन (कवक एवं शैवाल) का पार्क है।
दुनिया भर में लाइकेन की 20,000 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में इसकी 2714 प्रजातियां हैं जबकि उत्तराखंड में लगभग 600 प्रजातियां हैं। लाइकेन के लिए अनुकूल स्थान होने के कारण दो वर्ष पहले जून 2020 में वन विभाग ने मुनस्यारी में दो हेक्टेयर भूमि में लाइकेन पार्क विकसित किया था। मुख्य वन संरक्षक (कार्ययोजना) संजीव चतुर्वेदी के निर्देशन में बनाए गए अपनी तरह के इस पहले पार्क में लाइकेन की 120 प्रजातियां विकसित की गई हैं।
मुनस्यारी में विकसित किया गया विश्व का पहला लाइकेन पार्क सैलानियों के लिए सर्वाधिक आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। देश विदेश से घूमने के लिए मुनस्यारी आने वाले सैलानी लाइकेन की विशेषता से भी रूबरू हो पा रहे हैं। इस लाइकेन पार्क का सबसे अधिक फायदा शोधार्थियों को मिल रहा है। देश भर से शोधार्थी लाइकेन पर शोध करने के लिए मुनस्यारी पहुंच रहे हैं। अब तक 50 हजार से अधिक सैलानी और शोधार्थी इस लाइकेन पार्क का भ्रमण कर चुके हैं।
स्थानीय भाषा में कहा जाता है झूला या पत्थर के फूल
पिथौरागढ़। लाइकेन (शैवाल और कवक) मुख्य रूप से पेड़ों के तनों या फिर पत्थरों पर पाया जाता है। सबसे अधिक लाइकेन बांज के पेड़ों की छाल पर उगता है। पेड़ों पर पाए जाने वाले लाइकेन को झूला जबकि पत्थरों पर फूल की आकृति में दिखने पर इसे स्थानीय भाषा में पत्थर के फूल भी कहा जाता है। पेड़ों पर पाए जाने वाले लाइकेन का दोहन सुगंधित मसाले तैयार करने के लिए भी किया जाता रहा है। कन्नौज का इत्र बनाने में भी लाइकेन का प्रयोग होता है। परंपरागत औषधियों के रूप में भी लाइकेन का उपयोग किया जाता रहा है। संवाद
पार्क में बनाई हैं डायनासोर सहित तमाम आकृतियां
पिथौरागढ़। मुनस्यारी में विकसित किए गए लाइकेन पार्क में डायनासोर सहित तमाम आकृतियां बनाई गई हैं। इन आकृतियों को बनाने का मकसद धरती पर लाइकेन की मौजूदगी के इतिहास को बताना है। पार्क में मानव आकृतियां, पक्षियों के घोंसले भी बनाए गए हैं। यहां आने वाले पर्यटकों को पार्क में स्थापित परिचय केंद्र के माध्यम से लाइकेन से जुड़ी जानकारी के साथ ही पारिस्थितिकी तंत्र से भी अवगत कराया जा रहा है। संवाद
मुनस्यारी में बनाया गया लाइकेन पार्क दुनिया का पहला लाइकेन पार्क है। लाइकेन की उपलब्धता के नजरिये से उत्तराखंड देश के पांच सबसे समृद्ध राज्यों में एक है। पिथौरागढ़ का मुनस्यारी ऐसा स्थान है जहां लाइकेन की लगभग 120 प्रजातियां पाई जाती हैं। यहां पर बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। इस पार्क के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों तक बेहद उपयोगी और उपेक्षित रहे लाइकेन की उपयोगिता की जानकारी पहुंच रही है। -संजीव चतुर्वेदी, मुख्य वन संरक्षक कार्ययोजना, उत्तराखंड।