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Pithoragarh News: कथा व्यास ने सुनाया कुंती और दुर्वासा ऋषि का प्रसंग

Fri, 23 Jun 2023 11:16 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
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गंगोलीहाट (पिथौरागढ़)। मां छिमाल (क्षमा देवी) मंदिर में हाट पठक्यूड़ा सहित क्षेत्र की जनता के सहयोग से आयोजित श्रीमद् देवी भागवत कथा में व्यास शास्त्री किशोर जोशी ने कुंती के दुर्वासा ऋषि से प्राप्त मंत्र शक्ति और कर्ण के पैदा होने की कथा का वाचन किया। कथा सुनने के लिए हजारों की संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंच रहे हैं।
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शुक्रवार को व्यास जोशी ने कथा वाचन करते हुए कहा कि बचपन में कुंती ने एक बार दुर्वासा ऋषि का बहुत अच्छे तरीके से अतिथि सत्कार किया था। जिससे प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कुंती को एक मंत्र दिया, जिससे वह किसी भी देवता को बुला सकती थी। एक दिन कुंती के मन में उस मंत्र को आजमाने का ख्याल आया। अपने महल से बाहर निकलीं तो देखा कि सूर्य देव अपनी पूरी भव्यता में चमक रहे थे। उनकी भव्यता देखकर मंत्र पढ़कर कहा मैं चाहती हूं कि सूर्य देव आ जाएं। सूर्य देव आए और कुंती गर्भवती हो गई और एक बालक का जन्म हुआ। तब कुंती 14 साल की अविवाहित स्त्री थी। उसे समझ नहीं आया कि ऐसे में सामाजिक स्थितियों से कैसे निपटा जाएगा। उसने बच्चे को एक लकड़ी के डिब्बे में रख दिया। बिना उस बच्चे के भविष्य के बारे में सोचे, उसे नदी में बहा दिया।
अधिरथ को मिला नन्हा कर्ण मिला
अधिरथ उस समय नदी के किनारे पर ही मौजूद रहे। उसकी नजर इस सुंदर डिब्बे पर पड़ी तो उसने उसे खोलकर देखा। एक नन्हें से बच्चे को देखकर वो आनंदित हो उठा। क्योंकि उसकी कोई संतान नहीं थी। उसे लगा कि ये बच्चा भगवान की ओर से एक भेंट है। वो इस डिब्बे और बच्चे को अपनी पत्नी राधा के पास ले गया। दोनों आनंद विभोर हो गए। उस डिब्बे की सुंदरता को देखकर वे समझ गए कि ये बच्चा किसी साधारण परिवार का नहीं हो सकता। अधिरथ महाराज धृतराष्ट्र के यहां सारथी का काम करता था। अधिरथ खुद एक सारथी था, इसलिए वह कर्ण को भी रथ चलाना सिखाना चाहता था। पर कर्ण तो धनुर्विद्या सीखने के लिए बेचैन था। उन दिनों, सिर्फ क्षत्रियों को शस्त्रों और युद्ध कला की शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार था। ये राजा की ताकत को सुरक्षित रखने का एक सरल तरीका था। क्योंकि अगर हर कोई शस्त्रों का इस्तेमाल करना सीख जाता, तो फिर सभी शस्त्रों का इस्तेमाल करने लगते। कर्ण क्षत्रिय नहीं था, इसलिए उसे जब किसी भी शिक्षक ने स्वीकार नहीं किया तब परशुराम ने उसे को शस्त्र विद्या ज्ञान दिया।
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चार दिवसीय काष्ठ यज्ञ का समापन
गंगोलीहाट (पिथौरागढ़)। बरसों पहले पिता की ओर से लिए गए प्रण को पत्नी और पुत्रों ने छुरमल मंदिर में चार दिवसीय काष्ठ यज्ञ कर पूरा किया। शुक्रवार को पूरे पारंपरिक तरीके से विधि-विधान मंत्रोचार हवन कन्या पूजन और महा भंडारे के साथ यज्ञ का समापन हुआ। नड़कद्यो निवासी दान सिंह ने कई वर्ष पूर्व इस यज्ञ को करने का प्रण लिया था। उनके देहांत के बाद उनकी पत्नी हरूली देवी पुत्र जगत सिंह कार्की बसंत सिंह कार्की नंदन सिंह कार्की राजेंद्र सिंह कार्की ने काष्ठ यज्ञ का आयोजन किया। संवाद
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