पिथौरागढ़। अपनी खूबसूरती के लिए विश्व-विख्यात बुग्याल (घास के मैदान) संकट में हैं। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्थित इन बुग्यालों में यारसा गंबू दोहन के लिए हर साल हजारों की संख्या में लोग जा रहे हैं। 14 हजार फुट की ऊंचाई तक स्थित बुग्यालों में मानव की चहलकदमी बढ़ने से जैव विविधता के भी खतरे में पड़ने के आसार पैदा हो गए हैं।
उत्तराखंड में कई बुग्याल अपनी खूबसूरती के लिए विख्यात हैं। पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली, उत्तरकाशी और रुद्रप्रयाग में स्थित इन बुग्यालाें को देखने के लिए देश विदेश से सैलानी आते हैं। इन बुग्यालों में दुर्लभ जड़ी- बूटियां, फूल और पौधे पाए जाते हैं। आज से दो दशक पहले तक निचले इलाकों के बुग्याल भेड़-बकरियों के चरागाह थे। हिमालयी क्षेत्र में रहने वाले चुनिंदा भेड़ पालक अपनी भेड़ों को छह माह के प्रवास पर इन बुग्यालों में लेकर जाते थे। वर्ष 2004 में यारसा गंबू के प्रकाश में आने के बाद इन बुग्यालों में बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही बढ़ी है।
पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी और धारचूला के उच्च हिमालयी क्षेत्र में कई खूबसूरत बुग्याल हैं। इनमें नग्निधूरा, खेरलीवन, झंडाधार, पंचाचूली और धारचूला में छिपला केदार के चेरती, रक्षापुलस्थित बुग्यालों में यारसा गंबू के दोहन के लिए पिछले डेढ़ दशकों से बड़ी संख्या में लोग पहुंच रहे हैं।
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हर साल 10 हजार से अधिक लोग पहुंच रहे बुग्यालों में
पिथौरागढ़। यारसा गंबू निकालने के लिए धारचूला और मुनस्यारी के बुग्यालों में हर साल 10,000 से अधिक लोग पहुंचते हैं। यह लोग वहां पर टेंट लगाकर रहते हैं। अधिक ऊंचाई पर होने के कारण वहां पर पेड़-पौधे नहीं होते हैं। खाना बनाने के लिए भोज पत्र और बिल्व के ही पेड़-पौधों का दोहन किया जाता है। मुनस्यारी के हीरा सिंह चिराल ने बताया कि पिछले 15 साल में वनस्पति का दोहन किया जा चुका है। अब वहां पर पेड़ पौधों की संख्या काफी कम हो चुकी है। यदि इसी तरह दोहन होता रहा तो कई वनस्पतियां समूल नष्ट हो जाएंगी। इससे जैव विविधता खतरे में पड़ जाएगी।
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नेपाल से भी बुलाए जाते हैं मजदूर
पिथौरागढ़। यारसा गंबू का दोहन पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्र से पिछले कई दशकों से हो रहा था। वर्ष 2002 में एक तस्कर के भालू की पित्ती के साथ पकड़े जाने के बाद यारसा गंबू प्रकाश में आया था। इस शक्तिवर्द्धक कीड़ा जड़ी को भारतीय बुग्यालों से निकालकर तस्कर नेपाल होते हुए चीन की मंडी तक पहुंचाते थे। उस समय यारसा गंबू की कीमत 12 से 15 लाख रुपये किलो थी। अब शासन ने वन पंचायतों के माध्यम से ग्रामीणों को कीड़ा जड़ी दोहन की अनुमति दी है।
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यारसा गंबू दोहन के कारण बुग्यालों में चहल कदमी बढ़ी है। इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है। वहां जाने वाले लोग भोजन के लिए दुर्लभ और बेहद कम संख्या में पाए जाने पेड़ पौधों को काटकर जलाते हैं। इससे वनस्पतियां भी नष्ट हो रही हैं। पर्यावरण संरक्षण और जैव विविधता के महत्व को देखते हुए वर्ष 2018-19 में ग्रामीणों के बीच जाकर जागरूक किया गया था। ग्रामीण वन पंचायत वाले क्षेत्रों में जाकर पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखें इसके लिए फिर से वन विभाग जागरूक करेगा।
संजीव चतुर्वेदी, प्रमुख वन संरक्षक उत्तराखंड।
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