फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Pithoragarh News: किसी चुनौती से कम नहीं मौत बनकर झांकती इन चट्टानों से सुरक्षित निकल पाना

Mon, 09 Oct 2023 12:57 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
विज्ञापन
धारचूला गुंजी सड़क पर गर्भधार और लखनपुर के बीच कटे पहाड़।
विज्ञापन
यात्रा वृतांत
विज्ञापन


धारचूला (पिथौरागढ़)। चीन सीमा को जोड़ने वाली धारचूला-लिपुलेख सड़क पर धारचूला से गुंजी तक का सफर आसान नहीं है। इस सड़क पर कम से कम 50 स्थान ऐसे हैं जहां पर चट्टानें मौत बनकर झांक रहीं हैं।
इन चट्टानों से कब विशालकाय बोल्डर टूटकर सड़क पर गिर जाय, कहा नहीं जा सकता। इन स्थानों पर वाहनों में सफर कर रहे यात्रियों या पैदल चल रहे लोगों के लिए सुरक्षित निकलना किसी चुनौती से कम नहीं है।
विज्ञापन

चार अक्तूबर की सुबह छह बजे हम आदि कैलाश जाने के लिए दो पहिया वाहन से धारचूला से गुंजी के लिए रवाना हुए। इन दिनों धारचूला से आगे के लिए सड़क कटिंग का काम चल रहा है। रात को बारिश हुई थी। इस कारण सड़क कटिंग का मलबा कीचड़ में तब्दील हो गया था।
करीब पांच-छह किमी आगे चले तो सड़क के नीचे काली नदी का शोर सुनाई देने लगा। पहाड़ी की ओर एक के ऊपर अटके बोल्डरों का पहाड़ तो नीचे उफनाई नदी डराने के लिए काफी थी। थोड़ा सा चूके तो सीधे एक हजार फुट नीचे काली नदी में गिर जाते।
एक बार लगा कि इस खतरनाक सड़क पर आकर गलती कर दी। कुछ जगहों पर हॉटमिक्स सड़क नजर आती तो लगता कि अब आगे का सफर ठीक होगा लेकिन कुछ 500 मीटर बाद ही फिर उबड़ खाबड़ सड़क पर वाहन के साथ पूरा शरीर भी झटके खाने लगता।
करीब 35 किमी का सफर तय करने के बाद पांगला गांव नजर आया। डामर वाली सड़क होने से इस क्षेत्र में पांच-सात किमी का सफर आसानी से तय हुआ लेकिन असली सफर तो अभी शेष था।
गर्बाधार से फिर चट्टानें और नीचे शोर करती काली नदी डराने लगीं। कठोर चट्टानों को काटकर बनाई गई सड़क के ऊपर लटकी चट्टानों को देखकर ऐसा लगता जैसे अभी पूरी चट्टान टूटकर हमारे ऊपर गिर पड़ेगी।
चट्टानों के बीच से अलग होकर लटके पत्थरों को देखने में डर लग रहा था लेकिन इन खतरनाक पहाड़ियों के फोटो खींचने से स्वयं को रोकना भी कठिन था। ऐसे में बाइक चला रहे विपिन गुप्ता को थोड़ा संभलकर चलाने के लिए कहता और खुद मोबाइल फोन से फोटो खींच लेता।
नजंग पुल के पास पहुंचे तो इस स्थान को पहचान लिया था। कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान इस स्थान की फाइल फोटो कई बार निकालनी पड़ती थी। इसमें यात्री बेहद संभल-संभलकर चलते नजर आते थे। हालांकि अब उस रास्ते को काटकर सड़क बना दी गई है लेकिन यहां पर काली नदी बेहद संकरी होने से इतने वेग से बहती है कि पत्थरों से टकराने के बाद पानी की बूंदें 10 मीटर ऊपर सड़क तक पहुंच जाती हैं।
बेहद वीरान इस स्थल पर सिहरन पैदा हो गई। इन चट्टानों को देखकर समझ में आया कि बीआरओ ने किन कठिन हालात में पहाड़ियां काटकर सड़क बनाई होगी। नजंग को सुरक्षित पार किया तो फिर मालपा आ गया।
वर्ष 1998 में 60 कैलाश यात्रियों समेत 205 लोगों की इसी स्थान पर दबकर मौत हो गई थी। मालपा की पहाड़ी को देखा तो कम से कम 3,000 फुट की ऊंचाई पर टूटी चट्टान वाला स्थान और चट्टानों के टूटने के बाद काली नदी तक पहुंचे टुकड़ों की रगड़ के निशान पहाड़ी पर दिखे।
अच्छी सड़क की उम्मीद में सफर जारी रहा लेकिन लामारी के बीच फिर पहाड़ी डराती रही। पेलसिती झरने में दो हजार फुट की ऊंचाई से गिर रहे पानी ने भिगो दिया। ऐसा लगा जैसे हजारों फुट ऊपर से गिर रहे पानी के बीच से गुजरने में सांस थम जाएगी।
बुंदी पहुंचे तो कुछ राहत मिली, लेकिन छियालेख की चोटी तक पहुंचने के लिए ढाई से तीन हजार फुट की पहाड़ी को काटकर बनाए गए मोड़ों को सुरक्षित पार करना भी किसी चुनौती से कम नहीं था। पहाड़ी से कोई पत्थर तो लुढ़ककर नहीं आ रहा इसका डर बार-बार ऊपर की ओर देखने के लिए मजबूर कर देता।
सड़क पर बिखरे रोड़े मोटरसाइकिल का बैलेंस बिगाड़ देते तो लगता कि पलटकर सीधे हजारों फुट नीचे खाई में गिर जाएंगे। जैसे-तैसे बुंदी से छियालेख तक 26 मोड़ पारकर छियालेख की चोटी पर पहुंचे तो कुछ राहत महसूस हुई। छियालेख इनर लाइन है।
जब आईटीबीपी के जवान हमारे पास जांच रहे थे तभी गुंजी की ओर से आ रहे माउंटेन बाइकर्स के दल में से एक बाइक राइडर सड़क पर बने कीचड़ के तालाब में गिर गया। सेना और आईटीबीपी के जवानों ने उसे उठाकर चेकपोस्ट तक सुरक्षित पहुंचाया। उसके पैर में चोट लग गई थी और बाइक भी क्षतिग्रस्त हो गई थी।
इसके बाद हम आगे के लिए रवाना हो गए। जहां भी इस तरह के कीचड़ से पटे तालाब थे। वहां पर मैं बाइक से उतर जाता और विपिन गुप्ता को सुरक्षित स्थान दिखाता। यहां से गर्ब्यांग तक करीब तीन किमी का सफर कुछ सुरक्षित रहा। हालांकि मोड़ों का तीखा ढलान कई परेशानियां पैदा कर देता था लेकिन उसके बाद फिर वही चट्टानी मार्ग शुरू हो गया।
बेहद खस्ताहाल सड़क और ऊपर लटकते बोल्डर ने फिर मन को डरा दिया। 70 किमी की इस कठिन दूरी को तय करने के बाद गुंजी दिखने पर राहत महसूस हुई। धारचूला से गुंजी तक 72 किमी का सफर तय करने में हमें साढ़े छह घंटे लग चुके थे। अब हमें ज्योलिंगकांग जाने के लिए 40 किमी का सफर तय करना था। चट्टानी मार्ग अब समाप्त हो गया था।
इसके बाद हम कुटी गांव के लिए रवाना हुए लेकिन नाबि गांव से ऑक्सीजन की कमी के कारण बाइक के इंजन का भी दम घुटने लगा था। बीच में दो स्थानों पर ग्लेशियर का पानी बह रहा था। बाइक पलटने के डर से इन दोनों स्थानों पर मुझे चलकर दूसरी ओर जाना पड़ा। ग्लेशियर के ठंडे पानी में जैसे ही चला तो कंपकपी छूटने लगी।
दोपहर 1:50 बजे कुटी गांव पहुंचे तो ग्रामीणों ने बताया कि यहां से ज्योलिंगकांग मात्र 12 किमी की दूरी पर है। जब चले तो दो बज चुके थे। अब पेड़ तक नहीं दिख रहे थे। सड़क पर हॉटमिक्स का काम चल रहा है। इस कारण पूरी सड़क पर रोड़े बिछे होने से दोपहिया वाहन का संचालन आसान नहीं था।
विज्ञापन

जैसे-तैसे हम आखिरकार 3:00 बजे आदि कैलाश के ज्योलिंगकांग स्थित बेस कैंप पहुंच गए। सामने अद्भुत और अलौकिक शिव की भूमि आदि कैलाश को देखकर सफर के दौरान डरावनी पहाड़ियों का भय मन से उतर चुका था।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें