पिथौरागढ़। उच्च हिमालयी क्षेत्रों में छह माह के प्रवास से अपने मूल गांव लौटे उच्च हिमालयी क्षेत्रों के लोगों ने जड़ी-बूटी के साथ राजमा, मटर की खेती शुरू कर दी है। इसके अलावा उच्च हिमालयी क्षेत्रों प्राकृतिक रूप से उगने वाली जड़ी बूटी को एकत्र करना भी शुरू कर दिया है। पूर्व में उगाई गई जड़ी बूटियों और फसलों को पर्यटक खरीदकर अपने साथ ले जा रहे हैं। चीन और नेपाल सीमा से लगे व्यास घाटी के सात गांव बूंदी, गर्ब्यांग, नपलच्यू ,रांगकांग, नाभी, गुंजी, कुटी और दारमा घाटी के 14 गांव दर, नांगलिंग, सेला, चल, बालिंग, दुग्तु, सोन, दांतु, बोन, फिलम, तिदांग, गो, मारछा, सीपू में लोग छह महीने का प्रवास पूरा कर वापस आ गए हैं। वर्तमान यहां मटर, फाफर (कुट्टु) पलती, आऊ (एक किश्म का गेहूं) की खेती शुरू कर दी है। इसके अलावा यहां ग्रामीणों ने जड़ी बूटी सेकवा, जंगली जीरा और तुलसी की खेती भी शुरू कर की है। ग्रामीण अक्तूबर अंतिम सप्ताह तक खेती बाड़ी का कार्य निपटाकर फसलों को निचले क्षेत्रों को लाएंगे। संवाद
काश्तकार ज्योति दताल का कहना है कि वह प्रवास के दौरान उगाई गई फसलों और जड़ी बूटियों को प्रवास पर जाते समय निचले क्षेत्रों को लाते हैं। यहां वह इन फसलों और जड़ी बूटियों को बेचकर आजीविका चलाते हैं।
उच्च हिमालयी क्षेत्र में पाई जाती हैं दुर्लभ जड़ी बूटियां
पिथौरागढ़। उच्च हिमालयी क्षेत्र में कुटकी, अतीस, सालमपंजा, जटामासी, गंदरायण, वज्रदंती, कूट, चिरायता, वन तुलसी सहित कई बहुमूल्य जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं। तमाम बीमारियों के उपचार में काम आने वाली इन जड़ी-बूटियों का पहले सीधा दोहन किया जाता था। अधिक दोहन होने के कारण जड़ी-बूटियों के संकट में पड़ने के बाद सालमपंजा, जटामासी सहित कुछ अन्य जड़ी-बूटियों के दोहन और बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। इनका दोहन केवल नाप भूमि में खेती करने के बाद ही किया जाता है। संवाद
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जंबू, गंदरायण बिकता है 1000 रुपये किलो
पिथौरागढ़। जंबू, गंदरायण 800-1000 रुपये किलो, कुटकी 500 रुपये किलो बिकता है। जड़ी-बूटी की कीमत ग्रेडिंग के आधार पर तय की जाती है। कुटकी जड़ी बुखार, पीलिया, मधुमेह, निमोनिया में काम आती है। लीवर से संबंधित जितने भी टॉनिक बनते हैं, उनमें कुटकी की मात्रा जरूर होती है। डोलू गुम चोट में, मुलेठी खांसी में, अतीस पेट दर्द में, सालमपंजा शारीरिक दुर्बलता में लाभदायक होता है। गंदरायण कब्ज, गैस सहित पेट की तमाम समस्याओं में रामबाण साबित होता है। इसे राजमा की दाल में विशेष तौर पर प्रयोग किया जाता है। जंबू की तासीर गर्म होने के कारण इसे दाल में डाला जाता है। भोजपत्र, रतन जोत सहित कई प्रकार की जड़ी बूटी ऐसी हैं, जो धूप में प्रयोग होती हैं। संवाद