भक्त दर्शन पांडेय
पिथौरागढ़। देशभर में चुनाव का शोरगुल है लेकिन राजनीतिक दलों के इस चुनावी शोरगुल में इस बार भी उत्तराखंड की एकमात्र आदम जनजाति वनराजि की कोई चर्चा नहीं है। देश की आजादी के बाद भी चार अंकों का आंकड़ा नहीं छू पाई यह जनजाति आज तक कभी राजनीतिक दलों के एजेंडे में नहीं रही।
पिथौरागढ़ और चंपावत जिले में निवास करने वाले वनराजि उत्तराखंड की अकेली आदम जनजाति है। पिथौरागढ़ जनपद के डीडीहाट, धारचूला और कनालीछीना विकासखंड के नौ गांवों में वनराजि के लगभग 202 परिवार रहते हैं। इनकी आबादी करीब 702 है। डीडीहाट तहसील के वनराजि गांव मदनपुरी व कूटा चौरानी में कुल 54 परिवार, धारचूला तहसील के किमखोला, भक्तिरवा, चिफलतरा और गणां गांव में 96 परिवार, कनालीछीना विकासखंड के कंतोली, औलतड़ी और कुलेख तोक में 51 वनराजि परिवार रहते हैं।
वनराजि के कुछ परिवार चंपावत जिले के पोथ ग्राम पंचायत के खिरद्वारी तोक में भी रहते हैं। इनकी आबादी 120 है। दोनों जिलों में वनराजि मतदाताओं की संख्या लगभग 500 है। हर चुनाव में यह वनराजि परिवार अपने मत का प्रयोग तो करते हैं लेकिन सीमित जनसंख्या के कारण यह आदम जनजाति उत्तर प्रदेश शासन के दौर से लेकर आज तक राजनीतिक दलों के एजेंडे में शामिल नहीं हो सकी। संवाद
विधानसभा पहुंचने वाले पहले वनराजि थे गगन रजवार
राज्य गठन के बाद आदम जनजाति के गगन सिंह रजवार को धारचूला की जनता ने दो बार विधानसभा तक पहुंचाया था। इसके बावजूद इस जनजाति की दशा नहीं सुधर पाई। अब तक एक हजार का आंकड़ा तक नहीं छू पाई इस जनजाति के लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। मेहनत मजदूरी कर जीवनयापन करना इन परिवारों की मजबूरी है। इस जनजाति के बच्चों के लिए खोला गया एक स्कूल भी फंडिंग नहीं मिलने से बंद है। गरीबी के कारण वनराजि जनजाति परिवारों के अधिकतर बच्चे पांचवीं कक्षा के बाद नहीं पढ़ पाते हैं। वनराजि पहले लकड़ी के बर्तन और कृषि यंत्र बनाकर आजीविका चलाते थे। पहाड़ में अधिकांश परिवारों के कृषि को तिलांजलि देने से इस आदम जनजाति के बनाए सामान की बिक्री भी बंद हो गई। वर्तमान में सभी की आजीविका का साधन पशुपालन या फिर मजदूरी है।