अमर उजाला ब्यूरो, पिथौरागढ़। भेड़-बकरियों को भले ही ज्यादातर लोग ऊन और मांस का स्रोत मानते हों लेकिन जो क्षेत्र सड़क से नहीं जुड़ सके हैं वहां आज भी भेड़ बकरियों का इस्तेमाल सामान और राशन ढुलान के लिए होता है। इस बार सीमांत धारचूला क्षेत्र में लगभग 400 क्विंटल गेहूं और चावल उच्च हिमालयी क्षेत्र के लिए माइग्रेशन पर जा रही भेड़ और बकरियों की पीठ पर पांगला से गुंजी पहुंचाया गया। उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित बुंदी, गर्ब्यांग, नपलच्यू, गुंजी, नाभी, रोंगकांग, कुटि गांवों के लिए ग्रामीण हर साल जानवरों के साथ धारचूला से माइग्रेशन पर जाते हैं। अप्रैल-मई में बर्फ पिघलते ही माइग्रेशन शुरू हो जाता है और सितंबर में बर्फ गिरनी शुरू होते ही ग्रामीण जड़ी-बूटी की खेती-बाड़ी का काम कर वापस लौट आते हैं। इस बार कोरोना महामारी के कारण लॉकडाउन के कारण माइग्रेशन कुछ देरी से शुरू हुआ। इन ग्रामीणों के छह माह के लिए राशन की व्यवस्था पूर्ति विभाग की ओर से की जाती है।
उच्च हिमालयी क्षेत्र के सभी गांवों में राशन पहुंचाने के लिए पहले पांगला में खाद्यान्न डंप किया जाता है। जहां से घोड़े-खच्चरों से खाद्यान्न ढुलान किया जाता है। इस बार राजकीय अन्न भंडार पांगला से गुंजी के लिए भेड़ों और बकरियों की पीठ पर भी राशन ढोया गया। तराई से लौटकर पहुंची सैकड़ों भेड़ों की पीठ पर लगभग 400 क्विंटल खाद्यान्न गुंजी पहुंचाया गया। पिथौरागढ़ के जिला पूर्ति अधिकारी एमएस रावत ने बताया कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में राशन का भंडारण कर दिया गया है।
--::: सड़क बनने से वाहनों से पहुंचेगा राशन ::: पिथौरागढ़। कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग पर स्थित व्यास घाटी क्षेत्र भी अब सड़क से जुड़ चुका है। हालांकि इस सड़क पर अभी चौड़ीकरण और हॉटमिक्स होना है। चीन सीमा तक लिंक हो चुकी इस सड़क का इस्तेमाल अभी बीआरओ और सेना के वाहनों के लिए ही हो रहा है। व्यास घाटी के सात गांवों तक घोड़े-खच्चरों, याक या भेड़ों की पीठ पर दुर्गम चट्टानी रास्तों से राशन ढुलान काफी कठिन होता है। सड़क बनने के बाद सभी गांवों तक खाद्यान्न की आपूर्ति करना बेहद आसान हो जाएगा।