लालकुआं। उत्तराखंड के लोक गायक प्रह्लाद मेहरा का हृदय गति रुकने से निधन हो गया। इसके साथ लोक गायकी का अनमोल सितारा अपने प्रशसंकों को हमेशा के लिए निराश कर गया।
प्रह्लाद मेहरा ने पहाड़ की पीड़ा और वहां की दुश्वारियों को करीब से देखा। यही पीड़ा उनके अंतरमन से बाहर आई और यह दर्द एक गीत के रूप में तब्दील हो गया, जिसे प्रह्लाद मेहरा को गायकी के क्षेत्र में एक पहचान दिलाई। गीत एवं संगीत को अपने जीवन का अभिन्न अंग मान चुके प्रह्लाद मेहरा आकाशवाणी अल्मोड़ा में परीक्षा देने गए जहां उनकी आवाज का जादू दिखाई दिया और उन्हें वर्ष 89 में आकाशवाणी अल्मोड़ा द्वारा ए ग्रेड का दर्जा दिया गया।
यहीं से मेहरा का स्वर्णिम सफर शुरू हुआ और एक के बाद एक डेढ़ सौ से अधिक गाने उन्होंने अपने कॅरिअर में गाए। प्रह्लाद मेहरा वास्तव में गायक ही नहीं स्टेज कलाकार के रूप में जाने जाते थे। प्रख्यात लोक गायक ललित मोहन जोशी जो प्रह्लाद मेहरा को अपना आदर्श मानते हैं। एक मुलाकात में उन्होंने बताया था कि प्रह्लाद मेहरा एक मझे हुए आर्टिस्ट हैं और जिनके अंदर गायकी के अलावा संगीत और अभिनय सारी क्षमताएं समाई हुई हैं। बिंदुखत्ता के ही कॉमेडियन मंगल सिंह और जीवन दानू प्रह्लाद मेहरा की प्रतिभा के कायल रहे। मेहरा ने हुड़के की थाप में कई नाटकों को मूर्त रूप दिया है
हास्य कलाकार मंगल सिंह और जीवन दोनों ही प्रह्लाद मेहरा के निधन से बेहद व्यथित हैं। प्रह्लाद मेहरा ने जहां पहाड़ के दर्द को अपनी आवाज दी और पहाड़ै की चेली ले नी खाया द्वी रवाटा सुखै ले गाने के माध्यम से दर्द को बयां किया। उन्होंने पहाड़ की नैसर्गिक आभा को भी अपने गीतों का माध्यम बनाया और एक से बढ़कर एक गीत गाए। इसके अलावा उन्होंने प्रेमियों के युगल गीत को भी अपनी आवाज दी। प्रहलाद मेहरा ने पहाड़ की कई खूबियों को बहुत ही नजदीकी से समझा। सुदूर पहाड़ियों में जाकर लकड़ी और घास लाने वाली महिलाओं की जिंदगी को भी उन्होंने बहुत नजदीक से समझा। पहाड़ की महिलाएं जब घास और लकड़ी लाकर किसी दुकान में जलेबी खाती थी तो उस जलेबी का महत्व भी उन्होंने अपने गीतों में बताया है और गाया है कां छ तेरो जलेबी को डाब। प्रहलाद मेहरा कुमाऊनी नाटक की प्रस्तुति भी बहुत ही बारीकी और खूबसूरती से करते थे। उन्होंने भस्मासुर नाटक का निर्देशन भी बड़ी ही बखूबी से किया। प्रह्लाद मेहरा इसके अलावा देवीधुरा के बग्वाल मेले में अपनी आवाज का जादू बिखेरते रहे। पर्वतीय उत्थान मंच में भी वह एक विशेष किरदार की भूमिका निभाते रहे। मेहरा आज हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें हमेशा हम सबके बीच में रहेंगी।