नैनीताल। रानीबाग स्थित एचएमटी फैक्टरी की भूमि पर मिनी सिडकुल की स्थापना होने संबंधी खबरों ने बेरोजगारों को नए रोजगार सृजन का सपना तो दिखा दिया, लेकिन यह भी सच्चाई है कि यहां स्थापित बड़े कारखाने बंद होने से पहाड़ में औद्योगिक विकास का सपना परवान नहीं चढ़ा सका। भीमताल स्थित औद्योगिक घाटी इसका जीवंत उदाहरण है। यहां कभी हजारों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर रोजगार से जुड़े थे। वजह, कुप्रबंधन हो या श्रमिक असंतोष या फिर बाहरी राज्यों से कच्चा माल मंगाने और उत्पादित सामान को बाहर भेजने पर आने वाला खर्च। छूट का लाभ लेकर यहां से अधिकतर उद्योग पलायन कर गए। अब यहां बंद पड़ी फैक्टरियों के खंडहर ही शेष रह गए हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि एचएमटी की जमीन पर ऐसे उद्योग स्थापित किए जाएं जिनका कच्चा माल स्थानीय स्तर पर उपलब्ध हो और बाजार भी व्यापक हो।
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कभी 65 से अधिक उद्योग थे भीमताल की औद्योगिक घाटी
नैनीताल। वर्ष 1980 के शुरुआती दिनों में तत्कालीन केंद्रीय उद्योग मंत्री नारायण दत्त तिवारी ने भीमताल में आड़ू के मैदान के नाम से प्रसिद्ध 90 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर उत्तर प्रदेश इंडस्ट्रीयल कारपोरेशन के सहयोग से नामी गिरामी औद्योगिक घरानों के 65 से अधिक छोटे उद्योग स्थापित कराए। इनमें दस हजार से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिला था। यहां स्थापित प्रमुख उद्योगों में टेलीट्रानिक्स लिमिटेड व हिल्ट्रान, ऊषा रैक्टिफायर, ऊषा इंडिया लिमिटेड, विनकास जनरल कार्बन, एपिक इंडिया लिमिटेड, सोलार्सन बर्नर्स लिमिटेड, जिंदल फोटो फिल्म लिमिटेड, अपट्रान, डीएमडी मेडिकल डिवाईजेज आदि प्रमुख थे। इनमें टीवी, इलेक्ट्रानिक्स पार्ट्स, वाटर प्यूरीफायर, स्वास्थ्य संबंधी उपकरण और फोटो फिल्म आदि बनते थे।
करीब दस साल चलने के बाद ये सभी उद्योग एक के बाद एक बंद होते गए। उद्योगों की बंदी के पीछे प्रमुख कारण यह था कि इन उद्योगों को कच्चा माल भी देश के अन्य हिस्सों से यहां लाना होता था और उत्पादित माल का बाजार भी मैदान में ही था। चूंकि सरकार ने इन उद्योगों को दस साल के लिए अलग-अलग करों में छूट दी थी। अधिकतर उद्योगपतियों नेे सरकार की ओर से दी गई छूट का लाभ उठाया और जब छूट मिलनी बंद हुई तो कारखानों में ताले जड़ दिए। इन उद्योगों के बंद होने से हजारों लोग बेरोजगार हुए।
अलग राज्य बनने के बाद इस जमीन पर सरकार ने सिडकुल की स्थापना की है। वर्तमान में यहां करीब 12 छोटे उद्योग चल रहे हैं लेकिन नामी गिरामी औद्योगिक घरानों को उद्योग लगाने के लिए लीज पर दी गई भूमि में कहीं होटल तो कहीं होम स्टे संचालित हो रहे हैं जबकि कई उद्योगों को आवंटित जमीनों पर झाड़ियां उग आई हैं और भवन खंडहर बन गए हैं।
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हल्दूचौड़ की सोयाबीन फैक्टरी भी थी प्रसिद्ध
नैनीताल। वर्ष 1980 से लेकर 1995 तक हल्दूचौड़ की सोयाबीन फैक्टरी भी खासी प्रसिद्ध रही। इसकी स्थापना 1982 में एनडी तिवारी के प्रयासों से ही हुई थी। तब यहां सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला, लेकिन इसे भी कुप्रबंधन से नहीं बचाया जा सका। लगातार बढ़ते घाटे के कारण यह फैक्टरी भी वर्ष 1996 में हमेशा के लिए बंद हो गई और चार सौ से अधिक कर्मचारी बेरोजगार हो गए। इतना ही नहीं, क्षेत्र के उन हजारों किसानों को भी झटका लगा जो इस फैक्टरी के लगने के बाद सोयाबीन की खेती से जुड़े थे और फैक्टरी को सोयाबीन उपलब्ध कराते थे।
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कभी रामनगर में बनती थीं जीवन रक्षक दवाएं
नैनीताल। वर्ष 1980 का दशक ही था जब रामनगर के निकट मोहान में जीवन रक्षक दवाएं बनती थी। तब यहां आयुर्वेदिक और यूनानी दवाएं बनाने वाली फैक्टरी इंडियन मेडिकल फार्मास्युटिकल कारपोरेशन की स्थापना की गई। इसे मोहान फैक्टरी के नाम से भी जाना जाता रहा। यहां ढाई सौ से अधिक लोगों को रोजगार मिला था, लेकिन बाद के वर्षों में श्रमिक असंतोष के कारण यह फैक्टरी भी बंद हो गई।
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बेरीपड़ाव में थी पॉलिस्टर फिल्म की फैक्टरी
नैनीताल। वर्षों पहले हल्द्वानी के समीप बेरीपड़ाव में जलपैक इंडिया की स्थापित की गई थी। यहां पॉलिस्टर फिल्म का उत्पादन होता था। इस फैक्टरी में दो सौ से अधिक लोगों को रोजगार मिला था लेकिन वर्ष 2014 में यह फैक्टरी भी बंद हो गई जिसके चलते यहां कार्यरत कर्मचारी बेरोजगार हो गए।
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पटवाडांगर में होता था एंटी रेबीज का निर्माण
नैनीताल। नैनीताल के समीपवर्ती पटवाडांगर क्षेत्र में वर्ष 1959 में एंटी रैबीज की वैक्सीन बनाई गई। इससे पहले यहां पॉक्स वैक्सीन बनी। इन दोनों वैक्सीनों की देश-विदेश में खूब मांग थी। लगभग तीस एकड़ भूमि पर आज भी यहां आवासीय और अनावासीय भवन बने हुए हैं जबकि 25 एकड़ जमीन वन भूमि के रूप में दर्ज है। सरकारी उपेक्षा के चलते वैक्सीन बनाने वाली यह इकाई भी वर्ष 2002 में बंद हो गई। अब यहां की जमीन स्वास्थ्य विभाग के पास है।
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रानीबाग की एचएमटी फैक्टरी
नैनीताल। विकास पुरुष एनडी तिवारी ने केंद्रीय उद्योग मंत्री रहते हुए वर्ष 1985 में रानीबाग में एचएमटी घड़ी फैक्टरी स्थापित कराई थी। तब यहां सालाना 16 से 18 लाख घड़ियों का उत्पादन होता था। फैक्टरी में 1246 कर्मचारियों को रोजगार मिला था, लेकिन लगातार घाटे के कारण वर्ष 2016 में यह फैक्टरी बंद हो गई। इसके भवन अब जीर्ण-शीर्ण हालत में हैं।
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उत्तराखंड जब यूपी का हिस्सा था तब कुमाऊं में कई बड़े उद्योग लगे, लेकिन वे ज्यादा समय नहीं चल सके। अब हमारा प्रयास है कि रानीबाग स्थित एचएमटी फैक्टरी की जमीन पर ऐसे उद्योग स्थापित हों जो न केवल दीर्घकालिक हों, बल्कि उनसे स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिले। इसमें पर्यटन से जुड़े उद्योग प्रमुख हैं। इस संबंध में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से भी वार्ता की जाएगी।
-अजय भट्ट, केंद्रीय रक्षा एवं पर्यटन राज्यमंत्री (स्थानीय सांसद)।