हल्द्वानी रोडवेज बस अड्डा में आपाधापी और शोरशराबा नहीं है। ठिठुरन भरे मौसम में बस अड्डे के परिसर में खुले आसमान के नीचे फर्श पर ठिठुरते हुए लोग दुर्गंध के बीच रात काटने के लिए मजबूर हैं। शायद इस उम्मीद के साथ जैसे कुछ समय बाद मंजिल को जाने के लिए बस मिल जाएगी।
अमर उजाला की टीम जब सोमवार रात बस अड्डे में व्यवस्थाएं देखने पहुंची तो परिसर के अंदर करीब 50 लोग लेटे थे। बाहर भी कई यात्री बस का इंतजार कर रहे थे। परिसर के आसपास गंदगी का अंबार था। खाने की तलाश में घूम रहे लावारिस कुत्तों से भी यात्री बचते नजर आ रहे थे। बस अड्डे में सर्दी से बचने का कोई इंतजाम नहीं था। इस बीच गाड़ियों के हॉर्न को सुनकर कुछ यात्री उठ जाते हैं। बातचीत में कहते हैं कि इस समय कहां जाएं। होटल में ठहरने के लिए पैसा नहीं हैं। अगर होटल में ठहरेंगे तो बस का किराया कहां से आएगा?। समय काट रहे हैं, बस आए और हम किसी तरह घर पहुंच जाएं।
अल्मोड़ा के गोपाल सिंह बिष्ट खुले आसमान के नीचे बैठे हुए हैं। कहते हैं कि अल्मोड़ा से पहुंचे हैं, अब दिल्ली जाना है। बस का इंतजार कर रहे हैं। बिलासपुर से पहुंचे दीवान सिंह पिथौरागढ़ की बस के इंतजार में थे। टैक्सी के सफर के लिए कहते हैं कि किराया (950 रुपये) ज्यादा है। रोडवेज में करीब 450 में यह सफर हो जाता है। इसी बीच बस अड्डे पर पुलिसकर्मियों की चहलकदमी दिखती है।
दो पुलिसकर्मी यात्रियों से बातचीत करते हैं। आसपास राउंड लगाकर माहौल देखते हैं। परिसर से बाहर निकलते ही बस अड्डे के चौराहे पर पहुंचते हैं तो अलाव जला नजर आता है। कुछ यात्री आग सेंकते हुए बस अड्डे की तरफ आने वाली बसों के बाबत जानकारी लेते रहते हैं।