नैनीताल। हाईकोर्ट ने चमोली जिले के जोशीमठ में लगातार हो रहे भू धंसाव को लेकर दायर जनहित याचिका पर बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान नौ अध्ययन रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में कोर्ट में पेश की गई। इसके अध्ययन के लिए याचिकाकर्ता ने कोर्ट से समय मांगा। कोर्ट ने क्षेत्र में निर्माण कार्य पर रोक को बरकरार रखा है। मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को होगी।
मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी एवं न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। अल्मोड़ा निवासी पीसी तिवारी ने याचिका में कहा था कि1976 में मिश्रा कमेटी ने जोशीमठ को लेकर विस्तृत रिपोर्ट सरकार को दी थी। रिपोर्ट में कहा गया था कि जोशीमठ शहर मिट्टी व रेत कंकड़ से बना है। यहां कोई मजबूत चट्टान नहीं है। कभी भी भू धंसाव हो सकता है। निर्माण कार्य करने से पहले इसकी जांच की जानी आवश्यक है। जोशीमठ के लोगो को जंगल पर निर्भर नहीं होना चाहिए। उन्हें वैकल्पिक ऊर्जा के साधनों की व्यवस्था भी करनी चाहिए। 25 नवंबर 2010 को आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ पीयूष रौतेला व एमपीएस बिष्ट ने एक शोध जारी कर कहा था कि सेलंग के पास एनटीपीसी टनल का निर्माण कर रही है, जो अति संवेदनशील क्षेत्र है। टनल बनाते वक्त एनटीपीसी की टीबीएम फंस गई जिसकी वजह से पानी का मार्ग अवरुद्ध हो गया और सात सौ से आठ सौ लीटर प्रति सेकेंड के हिसाब से पानी बहने लगा। यह पानी इतना अधिक है कि इससे प्रतिदिन दो से तीन लाख लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। पानी की सतह पर बहने के कारण निचली भूमि खाली हो जाएगी, इसलिए इस क्षेत्र में भारी निर्माण कार्य बिना सर्वे के न किए जाएं। याचिका में कहा गया कि राज्य सरकार के पास आपदा से निपटने की तैयारियां अधूरी हैं, सरकार के पास अब तक कोई ऐसा सिस्टम नहीं है, जो आपदा आने से पहले उसकी सूचना दें। उत्तराखंड में 5600 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों मौसम का पूर्वानुमान लगाने वाले यंत्र नहीं लगे हैं। उत्तराखंड के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में रिमोट सेंसिंग इंस्टीट्यूट अभी तक काम नहीं कर रहे हैं, जिस वजह से बादल फटने जैसी घटनाओं की जानकारी नहीं मिल पाती। हाइड्रो प्रोजेक्ट टीम के कर्मचारियों के सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं है।