बरेली में दरोगा मनोज मिश्रा की हत्या और गदरपुर में सिपाही बसंत बोरा को रौंदकर मारने की वारदातों से साबित हो गया है कि पशु तस्करों का नेटवर्क सिर्फ एक प्रांत तक सीमित नहीं है।
पुलिस की जांच में आया है कि करोड़ों के कारोबार में पशु तस्करों का दायरा उत्तराखंड से लेकर यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल तक फैला है। पशुओं को सुरक्षित पहुंचाने के लिए तस्कर वाहन चालकों को इनाम देते हैं।
इसी कारण चालक पशुओं को पहुंचाने में जान की बाजी लगा देते हैं। यूपी के उन्नाव में भैंस, भैंसा के साथ पड़वा और बैल, गाय पश्चिम बंगाल के स्लाटर हाउस में सप्लाई किये जाते हैं। कहा जाता है कि पशु तस्करों के ऊपर सफेदपोशों और नौकरशाहों का भी हाथ है।
पशु तस्करों के गिरोह यूपी के कानपुर और इलाहाबाद में पशुओं को इकट्ठा करते हैं। उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों के छोटे छोटे तस्कर गाय,बैल, भैंस, भैंसा, पड़वा की चोरी कर या सस्ते दर पर खरीदकर बड़े गिरोह को बेच देते हैं। छोटे छोटे गिरोह ही हल्द्वानी और ऊधमसिंह नगर से पशुओं को उठाते हैं।
पशुओं को ट्रक या जीपों में भरने के बाद कई दिनों तक उनको चारा नसीब नहीं होता है। तस्कर भैंस, भैंसा और पड़वा को वध के लिए उन्नाव स्थित स्लाटर हाउसों में भेज देते हैं। इसी प्रकार गाय, बैल, बछिया वध के लिए बिहार के रास्ते पश्चिम बंगाल भेजे जाते हैं। तस्कर जिलेवार थानों के रेट तय कर लेते हैं।
ट्रक पार होने के बाद तस्करों के एजेंट थानावार पैसा थाने के कारखास (पैसा वसूलने वाला सिपाही) को देते हैं। पशु तस्करों के वाहन को पकड़ने पर सफेदपोश मदद कर उनको छुड़ा देते हैं। यदि किसी जिले के पुलिस अधिकारी सख्त हो जाते हैं तो ट्रकों का पार होना मुश्किल हो जाता है।
ऐसे हालात में तीन प्रांतों की चेकपोस्ट पार कराने में नौकरशाह और सफेदपोश मददगार साबित होते हैं। इनाम के चक्कर में ही पशु तस्कर सिपाहियों को भी कुछ नहीं समझते हैं। आड़े आने पर कुचलकर आगे बढ़ जाते हैं।