हल्द्वानी। ऊधमसिंह नगर पुलिस के हत्थे चढ़े दोनों माओवादियों के पीछे 2005 से आईबी और प्रदेश की खुफिया एजेंसी लगी हुई थी। एसएफटीओ का एक दरोगा दोनों के आवासों के इर्द गिर्द रहकर उनकी गतिविधियों पर नजर रखता था।
विभागीय सूत्रों के अनुसार 2004 में हंसपुर खत्ता स्थित जंगल में माओवादियों के कैंप के संचालन का पुलिस को पता लगा था। पुलिस की जांच से पता चला कि मनीष मास्टर ही रमेश और दिवाकर के नाम से इस कैंप में आता जाता था।
कैंप का खुलासा होने पर मनीष हल्दूचौड़ से गायब हो गया था। शक होने पर केंद्रीय खुफिया एजेंसी (आईबी) रमेश के पीछे लग गई। रमेश का साथी चंदौली जिले के सैय्यदराजा क्षेत्र के निवासी मनोज ने अपना नाम बदलकर अरविंद रख लिया था। आईबी ने स्थानीय खुफिया एजेंसी एसओसीटीएफ के एक दरोगा को दोनों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए हिदायत दी थी। दरोगा सादे कपड़े में हल्दूचौड़ से लेकर दिल्ली तक दोनों का पीछा किया करता था। दस दिन पहले उस दरोगा की सामान्य मौत हो गई।
ऊधमसिंह नगर पुलिस की ओर से पकड़े गए दोनों माओवादियों को पता नहीं था कि वे केंद्रीय खुफिया एजेंसी के रडार पर हैं। बिहार के मधुबनी में नक्सलियों द्वारा आपरेशन धमाका में दोनों का नाम प्रकाश में आया था। ये प्रतिबंधित संगठन को संचालित करने के लिए बिहार से लेकर दिल्ली तक सफेदपोशों से मिलते थे। केंद्रीय खुफिया एजेंसी के पास ऐसे सफेदपोशों के नाम भी है। आईबी के मना करने के कारण ही गिरफ्तारी पहले संभव नहीं हो रही थी।
एक दरोगा हर रोज गतिविधियों पर रख रहा था नजर, दिल्ली में सफेदपोशों से मिलने जाते थे दोनों