नैनीताल। ‘सूखाताल झील की तलहटी में मौजूद प्लास्टिक और गंदगी से पानी प्रदूषित हो रहा है। यदि शीघ्र नहीं चेते तो यह पानी नैनीझील तथा अन्य पेयजल स्रोतों को विषैला कर सकता है।’ कैंब्रिज विवि के शोधार्थी इतिहासकार सीओ सैक्स और भूगर्भ शास्त्री हैना बेरेट ने प्राथमिक शोध से यह निष्कर्ष निकाला है। सेंटर फार इकोलॉजी डेवलेपमेंट एंड रिसर्च देहरादून (सीडर) की ओर से उत्तराखंड के मसूरी, नैनीताल, हिमाचल के पालमपुर, राजगढ़ व नेपाल के धूलीखेर विदुर में विभिन्न विषयों पर शोध किए जा रहे हैं। जिसमें कैंब्रिज विश्वविद्यालय भी विशेष सहयोग कर रहा है। इसी क्रम में नैनी झील के मुख्य स्रोत सूखाताल झील पर शोध किया जा रहा है। समन्वयक डा. विशाल सिंह, अमित भाकुनी की मौजूदगी में स्थानीय निवासी दीपक बिष्ट के सहयोग से कैंब्रिज से आए शोधार्थियों ने शोध शुरू कर दिया है। प्राथमिक शोध में उन्होंने पाया कि नैनीझील को 40 फीसदी पानी उपलब्ध कराने वाली सूखाताल झील में पड़ा मलबा उसके डिस्चार्ज में अवरोधक बन रहा है। यहां पड़ा मलबा व गंदगी तलहटी में सीसी की तर्ज पर ठोस हो गई है। जिस कारण उससे पानी रिस नहीं रहा है। इसे दुरुस्त करने के लिए तीन से चार मीटर तलहटी से गाद व गंदगी निकालना पड़ेगा। उन्होेंने यहां स्थित कार पार्किंग की डिजाइन पर भी सवालिया निशान लगाया। कहा कि साफ्ट जमीन पर विशाल कांप्लैक्स नहीं बनना चाहिए था। समन्वयक डा. सिंह ने बताया कि ढाई साल तक यह शोध चलेगा। संबंधित रिपोर्ट शासन समेत संबंधित एजेंसियों को भी दी जा सकती है।