हल्द्वानी। शहर में 60 फीसदी आबादी का गला तर करने वाले नलकूपों की हालत खस्ताहाल है। पिछले सात महीने में ही 60 नलकूप खराब हो गए हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो हर तीसरे या चौथे दिन एक नलकूप खराब हुआ है। इन नलकूपों की मरम्मत के लिए भी विभाग ने 40 लाख से अधिक खर्चा किया है।
शहर के दशकों पुराने नलकूप अब हांफने लगे हैं। गर्मी, सर्दी और बरसात में आए दिन नलकूपों के फूंकने से पेयजल व्यवस्था चरमराने लगती है। ऐसे में जल संस्थान वैकल्पिक तौर पर टैंकरों के माध्यम से जलापूर्ति कराता है। वर्तमान में पूरे डिवीजन में 88 नलकूप संचालित हैं। इनमें से 55 नलकूपाें से शहरी क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति होती है। इनमें कुछ में नई मोटर लगी है। छह महीने पुरानी मोटर को संबंधित कंपनी की ओर से बदल दिया जाता है। इसमें विभाग का मोटर की मरम्मत का खर्च बच जाता है। छह महीने से अधिक पुरानी मोटर में विभाग को पूरा खर्चा वहन करना पड़ता है।
सात दिन में होती है मरम्मत
हल्द्वानी। एक नलकूप की मरम्मत में अधिकतम सात दिन लगते हैं। इस दौरान प्रभावित क्षेत्र में अनुमानित आबादी के अनुसार दो या तीन टैंकरों के माध्यम से जल आपूर्ति कराई जाती है। एक नलकूप की मोटर ठीक करने में जलसंस्थान का करीब डेढ़ लाख का खर्च आता है। जल संस्थान के एई नीरज तिवारी ने बताया कि नलकूप की मोटर खराब होने पर लोडिंग और लिफ्टिंग करने में 50 हजार से अधिक का खर्च आ जाता है। इसके बाद बाहर से मोटर को ठीक करने और नलकूप के संचालन को पूरी तरह सुचारु करने में एक लाख तक खर्च हो जाते हैं।
शहर में जलस्तर कम तो गांवों में पर्याप्त सप्लाई नहीं
हल्द्वानी। भूमिगत जलस्तर कम होने और मोटरों के खराब होने से अक्सर नलकूपों का संचालन प्रभावित होता है। इनमें शहरी क्षेत्र के नलकूप भूमिगत जलस्तर के कम होने से खराब हुए हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति में दिक्कतों के चलते नलकूप की मोटर खराब हुई है।
तकनीकी खामियों के चलते नलकूपों में खराबी होने पर उसे ठीक कराया जाता है। नलकूप में मोटर समेत अन्य खराबी आने पर अधिकतम 1.80 तक का खर्चा आता है। कई नलकूपों की मोटर वारंटी में थी जिन्हें वापस भेजकर दूसरी लगाई जाती है।
- रवि शंकर लोशाली, अधिशासी अभियंता, जल संस्थान