भवाली (नैनीताल)। चैत्र में वसंत ऋतु के आगमन के साथ ही नवविवाहिताओं को पहाड़ की अनोखी परंपरा भिटोली का इंतजार रहता है। चैत्र में नवरात्र के साथ हिंदू नवसंवत्सर की भी शुरुआत होती है। नव संवत्सर में पहाड़ की पारंपरिक परंपरा भिटोली का खास महत्व है। भिटोली का संबंध पहाड़ की विवाहिता बेटियों को अपने मायके से जुड़ाव से है। भिटोली का शाब्दिक अर्थ भेंट देने से है। कई दशकों पहले जब संचार के माध्यम नहीं थे, तब ससुराल में रहने वाली विवाहित लड़की को चैत्र में उसके मायके की कुशलक्षेम भिटोली को रूप में दी जाती थी। विवाहिता के मायके से भाई या पिता अपनी बेटी के ससुराल में जाकर उसे पकवान आदि भेंट करते थे। भिटोली की यह परंपरा कमोबेश कायम है, लेकिन आज इसका स्वरूप बदल चुका है। पहले के समय में भिटोली के रूप में पारंपरिक चीजें भेंट की जाती थी, मगर अब नए कपड़े, रुपये देने का प्रचलन बढ़ गया है। ग्रामीणों क्षेत्रों में मायके से भिटोली आने पर आसपास के लोगों को भिटोली के रूप में बतासे बांटने की परंपरा है। पहले के दशक में भाई या पिता के न जाने पर बेटी को भिटोली मनीऑर्डर देकर भी भेजी जाती थी। शादी के बाद की पहली भिटोली बेटी को बैशाख में दी जाती है। उसके बाद चैत्र में दी जाती है। कुमाऊंनी परंपरा के मुताबिक चैत्र में ग्रामीण क्षेत्रों में कामकाज थोड़ा कम रहता है। जंगलों में बुरांश खिलता है। बुजुर्गों के मुताबिक इस माह में काम से सुस्ताने के बाद बुरांश के फूलों को देख विवाहिता को मायके की याद आती है। इसलिए चैत्र में भिटोली देने की परंपरा है। इस परंपरा के लिए एक गीत भी प्रचलित है। ‘न बासा घुघुती चैत की याद ऐ जांछी मिकै मैत की’ चैत्र में घुघुती (एक पक्षी) तुम आवाज नहीं लगाओ, मुझे अपने मायके की याद आ जाती है। पहाड़ में आज भी विवाहिता को भिटोली का इंतजार रहता है।