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राधे नंद कुंवर समझाय रही होरी खेलो फागुन ऋतु आइ रही...

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हल्द्वानी। कुमाऊंनी होली में दिन और रात के अलग-अलग प्रहरों में अलग-अलग रागों में होलियां गाने का रिवाज है। पहली होली प्रथम पूज्य भगवान गणेश की गाई जाती है। नैनीताल निवासी लेखक नवीन जोशी बताते हैं कि माह के पहले रविवार से शुरू होने वाली निर्वाण की होलियां भी भगवान गणेश, शिव और कृष्ण भक्ति की होती हैं। यह सिलसिला शिवरात्रि तक चलता है। इनमें दैण होया सबूं हुं हो गणेश, बांणी गावै को दुब धरण लागि रयां, गणपति को भज लीजै जैसी होलियों से शुरू करते हुए श्याम सुंदर की सांवरी सूरत को क्यों मोहे याद दिलाए, माई के मंदिरवा में दीपक बारुं, जंगला में होली खेलें पशुपतिनाथ नगर नेपाल जैसी होलियां प्रमुख रूप से गाई जाती हैं। वहीं शिवरात्रि के बाद से शिव की होलियां अधिक गाई जाती हैं। शिवरात्रि से होलिका अष्टमी तक बिना रंग के ही होलियां गाई जाती हैं। होलिका एकादशी से लेकर पूर्णमासी तक खड़ी होली गीत जैसे शिव के मन मांहि बसे काशी, जल कैसे भरूं जमुना गहरी, सिद्धि को दाता विघ्न विनाशन, होरी खेलें गिरिजापति नंदन आदि होलियां गाई जाती हैं। बसंत पंचमी से होली गीतों में शृंगार रस चढ़ने लगता है। आयो नवल बसंत सखी ऋतुराज कहायो पुष्प कली सब फूलन लागी, जंगला राधे नंद कुंवर समझाय रही होरी खेलो फागुन ऋतु आइ रही... झिंझोटी राग में आहो मोहन शृंगार करूं मैं तेरा आदि होलियां गाई जाती हैं। फागुन माह में पुरुषों के द्वारा रंग के साथ खड़ी और महिलाओं के द्वारा बैठकी होलियां गाई जाती हैं। आंवला एकादशी को गांव-मोहल्लों के मंदिरों में चीर बंधन होता है और रंग डाला जाता है। होली गायन की शुरुआत बसंत के स्वागत गीतों से होती है।
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