लोगों ने हाथ से हाथ मिलाकर श्रमदान किया तो उसके परिणाम दिखने लगे हैं। दो दिन के श्रमदान में ही मलबे में दबे वाहन और आलमारियां दिखने लगे हैं। मलबे में दबी आईटीआई में श्रमदान से वाहनों के ऊपर जमा मलबा हटाकर आंदोलकारियों ने साबित कर दिया कि सरकार में इच्छा शक्ति होती, तो अब तक मलबा हटाया जा चुका होता। रविवार को श्रमदान में कई ग्राम पंचायतों के प्रधानों ने भी भाग लिया।
16/17 जून को आए केदारनाथ जलप्रलय के दौरान अलकनंदा नदी की बाढ़ में आईटीआई परिसर मलबे और पानी में डूब गया। कुछ दिन बाद पानी तो जमीन में समा गया, लेकिन मलबा अब तक हटाया जा सका है। पुराना श्रीनगर बचाओ संघर्ष समिति लंबे समय से मलबा हटाने और उसी स्थान पर आईटीआई निर्माण के लिए आंदोलन चला रही है। मुख्यमंत्री ने मलबा हटाने के लिए 15 लाख रुपये देने की घोषणा भी की, लेकिन ये पैसा मिल नहीं पाया।
सरकारी कार्यप्रणाली से नाराज लोगों ने शनिवार से सांकेतिक रूप से मलबा हटाने के लिए श्रमदान शुरू किया। दो दिन तक चले श्रमदान से दो वाहन और कुछ आलमारियां दिखाई देने लगी हैं। समिति के संयोजक कमलेश नैथानी ने कहा कि सरकार तक यह संदेश भेजा जा रहा है कि जब लोग बिना संसाधन के मलबा हटा सकते हैं, तो सरकार क्यों नहीं। मलबे में दिखाई दे रही सामग्री की फोटो सरकार को भेजी जाएगी, ताकि सरकार और शासन की आंखे खुले।
एक माह के लिए श्रमदान स्थगित
श्रमदान के बाद हुई बैठक में कहा गया कि एसडीएम और आईटीआई के प्रधानाचार्य ने रिपोर्ट शासन को भेजने के लिए एक माह का समय मांगते हुए श्रमदान न करने की अपील की है। दोनों अधिकारियों की बात मानते हुए एक माह तक श्रमदान स्थगित किया जा रहा है। कहा गया कि एक माह के अंदर आईटीआई में सफाई और भवन निर्माण शुरू नहीं होने पर ग्राम प्रधान ग्रामीणों के साथ श्रमदान करने पहुंचेंगे। इस अवसर पर खल्लू चमराड़ा की प्रधान सोनी देवी, कोटी के प्रधान उमाचरण रावत, लक्ष्मी बिष्ट, रमा देवी, पुनीता कठैत, कुंवर सिंह लिंगवाल, रमा देवी और दमयंती बिष्ट आदि उपस्थित थे।