देलचौंरी के निकट कांडा गांव में दो दिवसीय मंजूघोष मेला सोमवार से शुरू होगा। मेले के प्रथम दिन बलराज उत्सव में भक्तगण देवी-देवताओं के निसाण (प्रतीक चिन्ह) चढ़ाएंगे, जबकि दूसरे दिन मेले में भैया दूज उत्सव मनाया जाएगा।
श्रीनगर से करीब 13 किलोमीटर दूर कांडा गांव में मंजूघोष महादेव, महाकाली और मंजूदेवी मंदिर स्थित हैं। यहां हर साल दीपावली के दूसरे दिन से दो दिवसीय मेला (बड़ा व छोटा कांडा) का आयोजन किया जाता है। इस मेले में दूर दराज से भारी संख्या में श्रद्धालु निसाण लेकर पहुंचते हैं।
मंजुघोष मेला कांडा मेला के नाम से भी प्रसिद्ध है। पहले यहां पशुओं की बलि चढ़ाई जाती थी, लेकिन यहां पशु बलि विरोधियों और समाज सुधारकों के प्रयास से एक दशक पहले बलि प्रथा बंद हो गई। अब यहां केवल निसाण चढ़ाए जाते हैं।
मंजूघोष की मान्यता
मंजूघोष महादेव मंदिर कामदाह डांडा पर स्थित है। शिव पुराण के अनुसार इस पर्वत पर भगवान शंकर ने घोर तपस्या की थी। कामदेव ने उनकी तपस्या भंग करने के लिए फूलों के वाण चलाकर उनके अंदर कामशक्ति को जागृत किया था। क्रोधित शंकर भगवान ने कामदेव को भष्म कर दिया था। तब से इस पर्वत का नाम कामदाह पर्वत पड़ा। जो कालांतर में कांडा हो गया।
दूसरी कथा है कि मंजू नाम की एक अप्सरा ने यहां शक्ति प्राप्त करने के लिए भगवान शंकर की तपस्या की। उस पर श्रीनगर का राजा कोलासुर मोहित हो गया। जब वह अपने मकसद में सफल नहीं हुआ तो उसने भैंसे का रूप धर ग्रामीणों पर हमला कर दिया। यह मंजू देवी को सहन नहीं हुआ। उसने महाकाली का रूप धर कोलासुर का वध कर दिया। उसी की याद में कांडा मेला मनाया जाता है।