फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कागजों में रह गई हैं फायर लाइनें

Wed, 27 Apr 2016 08:49 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, पौड़ी
विज्ञापन
विज्ञापन
फायर सीजन में जंगलों में लगने वाली आग को फैलने से बचाने के लिए बनाई गई फायर लाइनें अब केवल कागजों में रह गई है। जंगलों में ये लाइनें नेस्तनाबूत हो चुकी हैं। फायर लाइनें नहीं होने से जंगलों में आग आसानी से दूसरे क्षेत्र में फैल जाती हैं।
विज्ञापन


फायर सीजन में उत्तराखंड के चीड़ के जंगलों में पहले भी दावाग्नि होती थी। अंग्रेजी शासनकाल में फायर सीजन में जंगलों के बीच में जगह-जगह पर सौ फीट, पचास फीट और तीस फीट चौड़ी फायर लाइनें बनाई गई थी। गढ़वाल वन प्रभाग में ही 115.28 किमी लंबी फायर लाइनें थी।

तब इन फायर लाइनों में पेड़ों को नहीं उगने दिया जाता। हर साल फायर लाइनों की सफाई की जाती थी। आजादी के कई वर्षों तक यह व्यवस्था रही। अब विभाग की ओर से इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। जंगलों में बनी ये फायर लाइनें अब पूरी तरह मिट चुकी है।
विज्ञापन


गढ़वाल 6714.12 किमी लंबी हैं फायरलाइनें
पौड़ी। वन विभाग के रिकार्ड के अनुसार गढ़वाल मंडल में 6714.12 किमी लंबी फायर लाइनें हैं। इनमें 195.48 किमी  फायर लाइनें 100 फीट चौड़ी, 817.49 किमी लाइनें 50 फीट चौड़ी, 960.40 किमी फायर लाइनें तीस फीट  चौड़ी हैं। जबकि 4738.75 किमी लाइनें तीस फीट से कम चौड़ी है। गढ़वाल मंडल में सर्वाधिक 3591.84 किमी फायर लाइनें शिवालिक वृत्त में थी। गढ़वाल वृत्त में 1466.87 किमी,  यमुना वृत्त में 1124.76 किमी और भागीरथी वृत्त में 530.65 किमी लंबी फायर लाइनें हैं।

उत्तराखंड के जंगलों में आग की घटनाओं को रोकने के लिए बनी ज्यादातर फायर लाइनें मिट चुकी है। इनमें बड़े बडे़ पेड़ हो गए हैं। वन अधिनियम के चलते इन्हें साफ करना संभव नहीं हो पा रहा है। इस मामले को लेकन वन विभाग सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहा है। ताकि इन फायर लाइनों को दुबारा अस्तित्व में लाया जा सके। -बीपी गुप्ता मुख्य वन संरक्षक नोडल दावाग्नि उत्तराखंड
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें