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बैरिस्टर मुकंदीलाल की जमीन हड़पने के प्रयास में दर्ज होगी एफआईआर

Tue, 09 Feb 2016 10:14 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो कोटद्वार
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बैरिस्टर मुकंदीलाल के पोते आनंद भरत सिंह के अधिवक्ता अमित सजवाण ने बताया कि भारत सरकार की ओर से वर्ष 1934 में बैरिस्टर मुकंदीलाल को कोटद्वार के गाड़ीघाट में नजूल भूमि दी गई थी। इस भूमि को अवैध तरीके से हड़पने के लिए लालकोठी कोटद्वार निवासी ले. कर्नल कुंवर अजय सिंह (रिटायर्ड) और उनकी पत्नी रूपमाला ने अपने रिश्तेदार और मित्रों के साथ मिलकर 16 मई, 2011 को एक संस्था मुकंदीलाल शीला हैड सोसायटी बनाई और उसे सोसायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत करवा लिया।

इसमें अधिकतर सदस्य उत्तराखंड के बाहर के निवासी दर्शाए गए। छह महीने बाद  दिसंबर, 2011 में इन्हीं सब लोगों ने स्वयं को उत्तराखंड का निवासी दर्शाते हुए मुकंदीलाल शीला हैड सहकारी समिति रजिस्टर्ड करवा ली। बैरिस्टर मुकंदीलाल के दामाद स्व. डी हैड से छह हजार वर्ग मीटर भूमि का दाननामा अपने नाम पर दिखाया और इस दाननामे में भूमि को नजूल के स्थान पर भूमिधरी दर्शाया। जब मुकंदीलाल के पोते आनंद भरत सिंह ने इस मामले में जानकारी हासिल की तो दाननामे की प्रति में भूमिधरी को हाथ से काटकर नजूल भूमि लिखा गया था। दाननामे में दानदाता की ओर से नजूल भूमि को क्रय शुदा भूमि बताते हुए भूमिधरी दर्शाया गया।
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कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए पाया कि विपक्षीगण ने अन्य लोगों के साथ मिलकर एक आपराधिक षड़यंत्र किया और इससे प्राप्त संपत्ति को जिला सहकारी बैंक में गिरवी रखकर करोड़ों रुपये का ऋण लिया है। नगर पालिका में इन लोगों ने नक्शा पास होने के संदर्भ में जो दस्तावेज दिए, उसमें भूमिधरी को काटकर नजूल शब्द दर्शाया गया है।
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कौन थे बैरिस्टर मुकंदीलाल
कोटद्वार। 14 अक्तूबर, 1885 में चमोली जिले के पाटली गांव, मल्ला नागपुर में जन्मे बैरिस्टर मुकंदीलाल जाने-माने विधिवेत्ता और लेखक थे। 1913 में वे इंग्लैंड गए और वहां से 1919 में बार-एट-ला की डिग्री प्राप्त कर स्वदेश लौटे। स्वदेश वापसी के बाद उन्होंने लैंसडौन में वकालत शुरू की। उत्तराखंड के कुली बेगार आंदोलन में वह कूद पड़े। 1926 में वे मुकंदीलाल जी बैरिस्टर से नाम से प्रसिद्ध हो गए। गढ़वाल सीट से वह प्रांतीय कौंसिल और 1927 में उपाध्यक्ष चुने गए। 1930 में वे पेशावर कांड के नायक वीरचंद्र सिंह गढ़वाली समेत अन्य सिपाहियों की पैरवी के लिए एबटाबाद चले गए। अंग्रेज सरकार पेशावर कांड को अपना अपमान (राजद्रोह) मानते हुए इसका बदला इन सिपाहियों को फांसी देकर चुकाना चाहती थी, लेकिन बैरिस्टर की दमदार बहस से पेशावर कांड के सभी सिपाही फांसी की सजा से बच गए। इनके योगदान को देखते हुए तत्कालीन केंद्र सरकार ने 1934 में कोटद्वार के गाड़ीघाट में कई बीघा नजूल भूमि उनके नाम स्वीकृत की।
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