कोटद्वार। कार्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) के क्षेत्र में पड़ने वाले पांड गांव के ग्रामीणों ने सीटीआर प्रशासन और वन विभाग के उच्चाधिकारियों से जमीन के बदले जमीन और मकानों का मुआवजा देने की मांग की है। कहा कि कड़े वन कानूनों के चलते ग्रामीण परेशान हैं। विस्थापन पर सरकार और वन विभाग की ढुलमुल नीति के चलते ग्रामीण कहीं के नहीं रह गए हैं। आजादी के सत्तर साल बाद भी गांव में बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंचीं। विस्थापन का मामला भी वर्ष 1998 से लटका हुआ है।
पांड विस्थापन समिति के अध्यक्ष सुरेंद्र प्रसाद घनसेला की अध्यक्षता में हुई ग्रामीणों की बैठक में जमीन के बदले जमीन और भवनों का मुआवजा देने की मांग की गई। कहा गया कि सरकार वन गुर्जरों पर तो मेहरबान है, लेकिन कड़े वन कानूनों के चलते उत्तराखंड के मूल निवासी प्रभावित ग्रामीणों की सुनने को तैयार नहीं है। ग्रामीण प्रमोद कुमार, राधाबल्लभ, सुधा देवी व विनोद कुमार का कहना है कि गत सात मार्च को लैंसडौन के विधायक दिलीप रावत की अध्यक्षता में हुई बैठक में भी दोनों प्रभावित गांवों के प्रभावितों ने अपनी मांगें सीटीआर प्रशासन के सामने रखीं। कहा कि ग्रामीण वर्ष 1998 से उनके गांव के विस्थापन के लिए वन विभाग के यहां चक्कर काट रहे हैं। वन्यजीवों की दहशत से जहां खेती किसानी छूट गई है, वहीं जान के लाले पड़ गए हैं। डर के मारे लोग दूसरे गांवों में शरण लिए हुए हैं। अपने गांव जाने के लिए भी ग्रामीणों को वन विभाग को 12 रुपये का टैक्स देना पड़ रहा है। आजादी के 70 साल बाद भी गांव के लोग सड़क, पानी, बिजली व स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस गए हैं।
लैंसडौन के विधायक दिलीप रावत ने कहा कि तैड़िया और पांड गांवों के विस्थापन की प्रक्रिया वन विभाग के स्तर पर लंबित है। विस्थापन पर सहमति बनाने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। ग्रामीणों की मांगें सही हैं।