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कोटद्वार में मतदाता बढ़े, फिर भी कम हुआ मतदान

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कोटद्वार। गढ़वाल संसदीय सीट के अंतर्गत मैदानी क्षेत्र में पड़ने वाले कोटद्वार विधानसभा क्षेत्र में पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों की तुलना में मतदाता तो बढ़े हैं, लेकिन मत प्रतिशत कम रहा, जिससे राष्ट्रीय दलों के पदाधिकारियों के माथे पर बल पड़े हुए हैं। कम मतदान को लेकर पदाधिकारी गुणा भाग में जुट गए हैं। कोटद्वार ही नहीं, इससे सटे लैंसडौन और यमकेश्वर में भी कमोवेश यही स्थिति है। मतदान के परिणाम तो भले ही 23 मई को सामने आएंगे, लेकिन फिलहाल कांग्रेस और भाजपा के पदाधिकारी कम मतदान को अपने पक्ष में ही मान रहे हैं।
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निर्वाचन आयोग ने स्वीप कार्यक्रम के तहत जन जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन कर मतदान का प्रतिशत बढ़ाने का पुरजोर प्रयास किया। इस कार्य में सरकारी, गैैर सरकारी संस्थाओं ने भी काफी प्रयास किए, लेकिन बृहस्पतिवार को हुए मतदान के दौरान लोग अपेक्षित संख्या में घरों से नहीं निकले। नतीजतन समूची गढ़वाल संसदीय सीट पर मतदान का प्रतिशत पिछली बार के मुकाबले कम रहा। इस बार कोटद्वार विधानसभा में 61.31 फीसदी मतदान हुआ। 2014 के लोकसभा चुनाव में कोटद्वार विधानसभा में 65.33 फीसदी मतदान हुआ था, जबकि इस बार मतदाताओं की संख्या में भी काफी इजाफा हुआ। दो साल पहले हुए 2017 के विधानसभा चुनाव में भी कोटद्वार विधानसभा में 68 फीसदी मतदान हुआ था।
यमकेश्वर विधानसभा में हुए लोकसभा चुनाव में 49.58 फीसदी मतदान हुआ, जबकि वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मतदान प्रतिशत 50.18 रहा। यही हाल लैंसडौन विधानसभा चुनाव का रहा। यहां इस बार के लोकसभा चुनाव में 43.97 फीसदी मतदान हुआ, जो 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के मुकाबले 3.03 फीसदी कम था। मतदाताओं की संख्या बढ़ने के बावजूद मत प्रतिशत घटने की वजह कुछ लोग नवरात्र के व्रत और गेहूं की फसल कटना बता रहे हैं। रामदयालपुर निवासी देवी प्रसाद ममगाईं, जगदीश सिंह नेगी व सिगड्डी निवासी एलडी जोशी कहते हैं कि पिछले सभी चुनावों के मुकाबले इस बार का चुनाव फीका रहा। प्रचार से पोस्टर व बैनर भी गायब रहे। मतदाता ही नहीं राजनीतिक दलों के पदाधिकारी भी उदासीन नजर आए।
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