लोहाघाट (चंपावत)। शहर से लगे रायनगर चौड़ी गांव के पूर्व फौजी हवलदार मोहन चंद्र राय की मेहनत रंग लाई है। पूर्व फौजी ने छत्तीसगढ़ से उन्नत प्रजाति के मक्के का बीज मंगाकर प्रयोग के तौर पर उसकी खेती की। इसके सुखद परिणाम सामने आए हैं। एक ही पौध में करीब छह से आठ मक्के लगने से यह आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
फौजी मोहन ने अपनी पत्नी बसंती राय के साथ खेतों में कड़ी मेहनत कर मक्के की बुआई की। इसमें किसी भी प्रकार के रासायनिक खाद का प्रयोग न कर केवल गाय के गोबर की जैविक खाद का प्रयोग किया। मोहन बताते हैं कि क्षेत्र में होने वाले मक्के में मेहनत ज्यादा और लाभ कम होता था। उन्होंने मक्के की प्रजाति बदलने का मन बनाया। इसके लिए छत्तीसगढ़ से उन्नत प्रजाति का बीज मंगाकर खेती शुरू की। उन्होंने बताया कि एक पौध में छह से आठ मक्के लगे हुए हैं। मक्के के बीज के लिए काफी लोगों की मांग हो रही है।
कोट
जिले में करीब 500 हेक्टेयर में मक्के की खेती होती है। आम तौर पर यहां क्यूपीएम प्रजाति के मक्के की खेती की जाती है। जिसमें एक पौध में एक से लेकर तीन मक्के लगते हैं। पूर्व फौजी मोहन राय का प्रयास काफी सराहनीय है। इनका प्रयास अन्य किसानों को प्रोत्साहित करने वाला है।
हिमांशु जोशी, कृषि और भूमि संरक्षण अधिकारी, लोहाघाट।
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पुराने जमाने में मक्का को गरीबों का भोजन कहा जाता था। अब यह अमीर लोगों की पहली पसंद बनी हुई है। मक्के में बड़ी मात्रा में फाइबर, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट होता है। मक्के का आटा भोजन को पचाने, गर्भवतियों, कुपोषित बच्चों और स्वास्थ्य के लिए काफी लाभकारी है।
डॉ. ज्ञान प्रकाश, चिकित्साधिकारी, उप जिला अस्पताल, लोहाघाट।