सरपंच राजेंद्र सिंह भंडारी। संवाद
चंपावत। यहां से पांच किमी दूर बाजरीकोट क्षेत्र के जंगल अब खूब हरे भरे हैं। अब ये वन सैलानियों को भी लुभाते हैं। यहा डेढ़ दशक पहले तक ऐसी हरियाली नहीं थी। आठ किमी वर्ग क्षेत्रफल में फैली इस पंचायती जंगल में बांज, उतीस, बुरांश, काफल के 4100 से ज्यादा पेड़-पौधे हैं। इनमें से करीब 50 प्रतिशत पौधे बीते डेढ़ दशक में वन पंचायत के मौजूदा सरपंच और सरपंच संगठन के ब्लॉक अध्यक्ष राजेंद्र सिंह भंडारी की मेहनत का नतीजा हैं। खाली जमीन पर पौधों को लगा उसे संवारना उनके जीवन का मकसद बन गया।
दुबई में 2008 में युवा बेटे कमल भंडारी की मौत के बाद टूट चुके भंडारी के लिए पौधों को बचाना और बढ़ाना जीवन का लक्ष्य बन गया। शुरुआती पांच साल तक उन्होंने बगैर किसी पद के अपनी वन पंचायत की देखभाल की। हरे पेड़ों को काटने से रोकने के साथ ही पत्तियों को तोडने वालों को ऐसा करने से रोकने के लिए प्रेरित किया। शुरुआती विरोध के बाद वे इस मकसद में सफल रहे।
पेड़ों को बचाने के साथ खाली भूमि पर पौधों को लगाने की निरंतरता से न केवल ग्रामीणों का नजरिया बदला बल्कि उन्हें सरपंच भी बनाया गया। उनके कामों को देखते हुए ग्रामीण वन पंचायत की देखरेख, पेयजल स्रोतों के संरक्षण और वनाग्नि से बचाव के लिए स्वयं प्रेरित हो रहे हैं।
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प्रदेश सरकार से भी मिला है सम्मान
चंपावत। बाजरीकोट वन पंचायत के सरपंच राजेंद्र सिंह भंडारी की वन संरक्षण की पहल को नागरिकों से लेकर सरकार तक ने सराहा। सितंबर 2011 में उत्तराखंड सरकार ने उन्हें वन पंचायत को समृद्ध बनाने और संयुक्त वन प्रबंधन में बेहतरीन काम के लिए सम्मानित किया।