लोहाघाट (चंपावत)। जलवायु परिवर्तन का असर न केवल मानव स्वास्थ्य और पशुपालन में पड़ रहा है बल्कि कृषि में भी इसका अच्छा खासा प्रभाव पड़ रहा है। यह बात वैज्ञानिकों के शोध में सामने आई है।
कृषि विज्ञान केंद्र लोहाघाट के वैज्ञानिक किसानों को स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए प्रेरित कर किसानों की आय बढ़ाने में मददगार साबित हो रहे हैं। केंद्र की उद्यान वैज्ञानिक डॉ. रजनी पंत ने बताया कि स्ट्रॉबेरी की खेती गर्म और ठंड दोनों जलवायु में की जा सकती है। केंद्र ने आन फॉर्म ट्रायल के अंतर्गत कई गांवों ढोरजा, बुंगा फर्त्याल, खैसकांडे, तिलौन, त्यारसों, सुंई, चौमेल, गोसनी, कायल आदि गांवों के किसानों को प्रशिक्षण के साथ स्ट्रॉबेरी की प्रजाति कैमरोजा और चांडलर की पौध प्रदान की गई हैं।
किसानों के खेतों पर इन प्रजातियों की पैदावार अच्छी हो रही है और किसानों की आमदनी भी बढ़ रही है। केंद्र से प्रशिक्षित बुंगा फर्त्याल के किसान राकेश उपाध्याय और खैसकांडे के रमेश खर्कवाल स्ट्रॉबेरी की खेती से अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। डॉ. पंत ने बताया कि किसानों की ताजी स्ट्रॉबेरी तीन सौ रुपये प्रति किलो बिक रही है। स्ट्रॉबेरी की पौध उपलब्ध कराने के अलावा कृषि विज्ञान केंद्र में इसकी खेती पर भी समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। संवाद
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जीवन ने ऑनलाइन बेची 40 हजार की स्ट्रॉबेरी
लोहाघाट (चंपावत)। सुंई के युवा काश्तकार जीवन खर्कवाल युवाओं को लगातार अपनी माटी से जुडऩे के लिए प्रेरित कर रहे हैं। जीवन बताते हैं कि उन्होंने शौक शौक में अपने घर पर स्ट्रॉबेरी की खेती की। जरूरत से ज्यादा स्ट्रॉबेरी को लोहाघाट की एक दुकान पर रख दिया। शाम को एक छोटे से डब्बे में दी गई स्ट्रॉबेरी के उन्हें 250 रुपये मिले। इससे प्रोत्साहित होकर उन्होंने आधी नाली में स्ट्रॉबेरी की खेती की। इस वर्ष उन्होंने ऑनलाइन 250 रुपये किलो के हिसाब से करीब 40 हजार रुपये की स्ट्रॉबेरी की बिक्री की। उन्होंने बताया कि इस वर्ष वह करीब पांच नाली में स्ट्रॉबेरी की खेती करने की तैयारी में जुटे हैं। संवाद
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स्ट्रॉबेरी की फसल को रोगों, खरपतवारों और पानी की कमी से बचाने के लिए किसानों को पॉलीमल्च विधि अपनानी चाहिए। मल्च का उपयोग ना करने पर स्ट्रॉबेरी के फल मिट्टी के संपर्क में आ जाते हैं जिससे फलों में ग्रे मोल्ड या धूसर फफूंदी का संक्रमण हो जाता है और फल सड़ जाते हैं। स्ट्रॉबेरी को पॉलीमल्च में लगाने से फलों में सडऩ रोग नहीं लगता है तथा पैदावार भी अच्छी होती है।
डॉ. भूपेंद्र खड़ायत, पौध सुरक्षा वैज्ञानिक, केवीके लोहाघाट।