चंपावत। मार्च की शुरुआत में ही बाजार में काफल का फल ग्राहकों के लिए उपलब्ध है। दुकानदार कुंदन सिंह बोहरा टोकरी में रखकर 200 रुपये किलो की दर से काफल बेच रहे हैं। महंगे होने के बावजूद काफल में रस नहीं हैं। इसकी वजह है इस फल का एक महीने पहले पकना। पहाड़ों में बेड़ू पाको बाराेमासा, काफल पाको चैता...(बेड़ू हर माह में पकता है, जबकि काफल चैत यानी मार्च के बाद पकता है) की कहावत उलटने लगी है। इस बार यहां मार्च की शुरुआत फागुन में ही काफल आ गए हैं।
समुद्र तल से चार हजार फीट से ऊंचाई वाले क्षेत्र में लगने वाला काफल यहां मुख्य रूप से मौनपोखरी, नरियालगांव, पुनाबे, पल्सो, ललुवापानी, मायावती, शंखपाल, बिनवालगांव, जैगांव जैतोली, सैदोला आदि गांवाें के जंगलों में होता है। जिला उद्यान अधिकारी टीएन पांडेय का कहना है कि मौसम चक्र में बदलाव से सर्दी में बेहद कम 30 मिली बारिश हुई। दिन में तेज धूप की तपिश के कारण काफल तय समय से एक महीने पहले पक गए हैं। इसी कारण इन काफल में खास स्वाद भी नहीं है। जिला आयुर्वेदिक अधिकारी डॉ. आलोक शुक्ला ने बताया कि काफल गुणकारी फल है। जंगली फल एंटी ऑक्सीडेंट गुणों के कारण लाभकारी होता है। पाचन में मददगार होने के कारण यह पेट के विकार भी दूर करता है।
पहाड़ में गर्मी और मौसम का जो मिजाज 15 अप्रैल के बाद होता था वह इस बार फरवरी से ही शुरू हो गया। गर्मी में बढ़ोतरी से अधिक तपिश और तापमान में बदलाव से काफल एक महीने पहले ही पक गया है लेकिन जल्दी तैयार होने से काफल में न रस है और न खास स्वाद। - डॉ. बीपी ओली, विभागाध्यक्ष, वनस्पति विज्ञान, डिग्री कॉलेज, चंपावत।