चंपावत। आलू के उत्पादन के लिए मशहूर इस जिले में आलू की बाहरी निर्भरता कम होगी। इसके लिए उद्यान विभाग स्थानीय स्तर पर बीज तैयारी की कार्ययोजना बना रहा है। पहले चरण में दो पौधशालाओं में आलू के बीज का उत्पादन किया जाएगा। इन दोनों पौधशालाओं में आलू लगा दिए गए हैं।
जिले का आलू की खेती में खूब नाम है लेकिन उसे आलू के बीज के लिए पिथौरागढ़ के मदकोट से लेकर हिमाचल प्रदेश तक आश्रित रहना पड़ता है। जिले में 700 क्विंटल बीज की मांग है। अब अगले दो साल में इस निर्भरता में काफी कमी आएगी। उद्यान विभाग ने जिले में आलू का बीज तैयार करने की कार्यनीति तय की है। इसके लिए दो पौधशालाओं मुड़ियानी और खतेड़ा में बीज तैयार करने के लिए 0.40 हेक्टेयर क्षेत्र में आलू की खेती शुरू कर दी गई है।
समय पर गुणवत्तायुक्त बीज न मिलने से पिछले कुछ समय से आलू के उत्पादन में कमी आ रही थी। जिले में आलू के बीज तैयार होने से न केवल समय पर बीज की उपलब्धता होगी बल्कि गुणवत्तायुक्त बीज मिलेंगे। इस कदम से आलू का रकबा भी बढ़ सकेगा।
बीज मिलने में देरी से पांच साल में 209 हेक्टेयर कम हुआ आलू का रकबा
चंपावत। मुख्य नकदी फसल होने के बावजूद आलू की खेती के प्रति लोगों का रुझान कम हो रहा था। चंपावत, खेतीखान सहित जिले के अधिकतर पहाड़ी हिस्सों में आलू की फसल बड़े पैमाने पर होती है। पांच हजार फीट से अधिक ऊंचाई के कारण यहां के आलू का स्वाद भी खास है लेकिन समय पर बीज न मिलने, मौसमी मार से आलू की खेती में कमी आ रही है। पांच साल में आलू की खेती 209 हेक्टेयर कम हो गई है। वर्ष 2023 में 899 हेक्टेयर में आलू का उत्पादन हुआ जबकि वर्ष 2017 में 1,108 हेक्टेयर में 11,187 मीट्रिक टन पैदावार हुई।
स्थानीय स्तर पर आलू के बीज की उपलब्धता के लिए मुडियानी और खतेड़ा पौधशाला में आलू की बुआई कराई गई है। 90 क्विंटल बीज होने का अनुमान है। ग्रेडिंग कर दिसंबर में ये बीज किसानों को बांटा जाएगा। स्थानीय जलवायु का बीज मिलने से उत्पादन में बढ़ोतरी के साथ अधिकतम लोग आलू की खेती के लिए प्रेरित होंगे। - टीएन पांडेय, जिला उद्यान अधिकारी, चंपावत।