चंपावत। जिले में पशुपालन विभाग के पास कार्मिकों की कमी है लेकिन दो माह का प्रशिक्षण लेने के बाद 32 पशुमित्र बेरोजगार हैं।
पहाड़ में खेती के साथ पशुपालन भी जरूरी है। इसके बावजूद जिले में पशु अस्पतालों और पशु प्रसार केंद्रों के हालात बहुत ठीक नहीं हैं। लंपी वायरस जैसे लक्षणों वाली बीमारी की वजह से चंद माह में जिले में 193 मवेशियों की मौत हो चुकी है जबकि आधारभूत ढांचे की कमी के कारण पशु केंद्रों में न कायदे की व्यवस्था है और न ही विभागीय ढांचा। जिले के 15 पशु अस्पतालों में से तीन में पशुचिकित्सक नहीं हैं जबकि 21 पशु प्रसार केंद्रों में से 10 केंद्रों में पशुधन प्रसार अधिकारी के पद खाली हैं। इसके बावजूद एसबीआई ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरसेटी) से प्रशिक्षित जिले के 32 पशुमित्र खाली हैं। पशुमित्रों का कहना है कि कृत्रिम गर्भाधन, टीकाकरण, पशुओं के सामान्य रोगों के इलाज में उनकी सेवाएं लेने से पशुपालकों को राहत मिलती।
चंपावत जिले में 2,43,000 पशुधन
चंपावत। तीन लाख की आबादी वाले चंपावत जिले में 1,34,000 लोग पशुपालक हैं। 1,07,000 गायों सहित 2,43,000 लाख से ज्यादा पशु हैं लेकिन विभागीय आधारभूत ढांचे की कमी से ग्रामीणों को मवेशियों के इलाज के लिए 15 से 45 किमी दूर तक जाना पड़ रहा है।
तीन पशु चिकित्सकों समेत जिले में दस पशुधन प्रसार अधिकारी कम हैं। इस वजह से दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में परेशानी है। आठ पशुमित्र संविदा पर रखे गए हैं। पशुमित्रों के ग्रामीण क्षेत्रों में होने से दूरदराज के गांवों में जानवरों के प्राथमिक स्तर के इलाज में राहत मिल सकेगी। उच्च स्तर पर पशु सेवा केंद्रों में पशुमित्रों को रखने पर विचार किया जा रहा है। - डॉ. डीके चंद, सीवीओ, चंपावत।