अमर उजाला ब्यूरो, चंपावत। नहीं मालूम कि मजदूर दिवस क्या है, ये कभी सुना नहीं। लेकिन यह जरूर पता है कि जैसे हालात इन दिनों हो रहे हैं, वैसे तो बिना काम के रहने पर भी नहीं हुए। 25 साल के उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के भोलूपुरा गांव के रामस्वरूप कहते हैं कि छह साल से मजदूरी कर रहा हूं, लेकिन ऐसा बुरा दौर कभी नहीं देखा। काम नहीं है, घर से दूर हैं, भाई दूसरी जगह फंसा है। गांव में गेहूं की फसल का क्या हुआ, यह भी ठीक से पता नहीं। चंपावत में 29 मार्च से फंसा उप्र का यह मजदूर कहता है हाथ में न दाम है और नहीं कोई काम। लॉकडाउन के चलते बंद जिंदगी मुसीबत में डाल रहा है। कामधंधा डेढ़ महीने से ठप है। आगे क्या होगा, नहीं पता। लेकिन अभी उनकी सबसे बड़ी चिंता घर में अकेले पड़े बूढ़े मां-बाप, बीबी और दो छोटे बच्चों की है। सात बीघा गेहूं लगा है, यह फसल कैसे कटेगी? रामस्वरूप कहता है कि गन्ना मजदूरी करने वाला उसका भाई केशव राम गोंडा में फंसा है। उसके ताऊ राधे लाल और चचेरा भाई छत्रपाल भी गोंडा में ही अटके हैं। रामस्वरूप बताता है कि परिवार के लोग बार-बार यही कहते है कि घर आ जाओ, पर वह इन हालातों में कैसे पहुंचे? जब भी घर पहुंचेगा, उसके बाद क्या होगा, कहां काम मिलेगा, इसकी भरपाई कैसे हैगी? इसकी चिंता उसे आज से ही है।