सड़क नहीं होने से पैदल रास्ता तय करते आमखर्क गांव के ग्रामीण। संवाद
चंपावत। स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के गांव तक सड़क पहुंचाने में तंत्र की सांस फूल रही है। सूखीढांग क्षेत्र के छोटे से गांव आमखर्क से चार सेनानी हैं लेकिन आजादी के 76 साल बाद भी गांव के लोग सड़क के लिए तरस रहे हैं। सड़क नहीं होने से यह गांव विकास की मुख्य धारा से ही दूर नहीं है बल्कि उत्तराखंड बनने के बाद से दो-तिहाई परिवारों ने पलायन भी कर दिया है।
आमखर्क चार सेनानी पंडित रामचंद्र चौड़ाकोटी, बेनीराम चौड़ाकोटी, पद्मादत्त चौड़ाकोटी और बची सिंह राना का गांव है। सड़क नहीं होने से बृजनगर से आमखर्क तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को सवा किमी पैदल जाना पड़ रहा है। 1960 से अनेकों बार आवाज उठाने के बावजूद सड़क नहीं पहुंची। इस साल तीन जून को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गांव तक सड़क पहुंचाने का एलान किया था लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई खास कदम नहीं उठाया जा सका है। लोनिवि के एई लक्ष्मण सिंह सामंत का कहना है कि मुख्यमंत्री के एलान के बाद इस सड़क बनाने के लिए जरूरी कार्रवाई की जा रही है।
सड़क नहीं होने का खामियाजाः उत्तराखंड बनने के बाद से आमखर्क गांव में 23 साल में 71 परिवारों में से 25 ही हैं। 46 परिवार पलायन कर चुके हैं। गांव तक जरूरी सामान पहुंचने में पांच प्रतिशत खर्च ढुलाना का बढ़ जाता है। आम समय के अलावा बरसात में यहां से आवाजाही टेड़ी खीर है।
कोट
सात दशक से अधिक समय से सड़क की गुहार लगाते थक गए हैं। पैदल चलने में मुश्किल होती है। कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री ने घोषणा की लेकिन सड़क पर काम अब भी शुरू नहीं हो सका है।
बृजमोहन चौड़ाकोटी,
कोट
सड़क की कमी से आवाजाही ही नहीं अन्य विकास कार्यों पर भी मार पड़ रही है। गांव में स्कूल और स्वास्थ्य की सुविधा नहीं होने से मुश्किल हो रही है।
सेनानी पुत्र, आमखर्क।