सैन्य शक्ति परीक्षण का माध्यम थी बगवाल
आज बगवाल को धर्म और परंपरा से जोड़कर देखा जाता है लेकिन इतिहास के आइने में ज्यादातर जगह इसे सैन्य शक्ति परीक्षण का माध्यम भी माना जाता था। इतिहासकार देवेंद्र ओली कहते हैं कि बगवाल का इस्तेमाल सैन्य परीक्षण के लिए भी होता था।
अंतिम बगवाल में विजयी रहने वाला धड़ा वर्षभर के लिए कुमाऊं, गढ़वाल, डोटी आदि इलाकों से कर वसूलने का हकदार हो जाता था। कत्यूरी, चंद, गोरखा और ब्रिटिश काल तक कुमाऊं के सारे गांव माहरा और फर्त्याल के धड़ों में बंटे थे। महाभारत के अनुसार बगवाल खेलने वाले महर, फर्त्याल, रावत, धौनी, देव, ढेक, खड़ायत, अधिकारी, मेहता, रावल आदि ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में भी भाग लिया था। संवाद
शुभ होता है बगवाल का दीदार
बाराही धाम में होने वाले बगवाल का गवाह होना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि बगवाल का दीदार करने वाले लोग बेहद खुशनसीब होते हैं। मां बाराही देवी की कृपा के बगैर न तो कोई बगवाल में भाग ले सकता है और न ही उसे देखने का सौभाग्य हासिल कर सकता है। बीते पांच दशकों के दौरान वर्ष 1997 में 26 मिनट तक बगवाल का युद्ध चला था। तब से आज तक इतनी लंबी अवधि तक बगवाल कभी नहीं हुई।
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कभी अंग्रेजों ने लगाई थी बगवाल पर रोक
प्रदेश में सिर्फ देवीधुरा में ही बगवाल होती है। अंग्रेजों ने बगवाल खेलने पर रोक भी लगाई। इसके चलते इससे जुड़े लोगों के खिलाफ धरपकड़ की कार्रवाई भी की। तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर ट्रेल ने इस दौरान खासा आतंक भी मचाया। इस कारण इलाके की ज्यादातर बगवाल बंद हो गईं लेकिन मान्यता है कि देवीधुरा की बगवाल को बंद कराने के आदेश देने से उसकी आंखों की रोशनी पर असर पडऩे लगा था जिस कारण कमिश्नर ट्रेल ने देवीधुरा की बगवाल को चलते रहने दिया।