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इतिहास के झरोखों से : सैन्य परीक्षण का माध्यम थी बगवाल, अंग्रेजों ने लगाई थी खेलने पर रोक, जानें ये कहानी

Fri, 01 Sep 2023 03:18 PM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, चम्पावत

सार

डॉ. जोशी के मुताबिक चमोली में बगवाल खेले जाने का ढंग एकदम अलग था। यहां पाषाण युद्ध का कोई रिवाज नहीं था। इस इलाके में बगवाल मशालों के साथ खेली जाती थी और बगवाल खेलने के समय में भी फर्क था।
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चंपावत के देवीधुरा में बगवाल के दौरान वार से बचने के लिए फर्रे का सहारा लेते बगवाली वीर। संवाद
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विस्तार
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जिले की बगवाल नगरी है देवीधुरा। लेकिन यहां कभी बगवाल सिर्फ पत्थर से या फल-फूलों से ही नहीं दूसरे अंदाज से भी खेली जाती थी। गढ़वाल में चमोली जिले में ऐसा ही कुछ होता था। जहां बगवाल की परंपरा बंद होने से पूर्व तक इसे मशाल के साथ खेला जाता था।

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इतिहासकार और खटीमा महाविद्यालय के इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशांत जोशी का कहना है कि बगवाल का स्वरूप सब जगह एक जैसा नहीं था। देवीधुरा को छोड़ बाकी जगहों पर बगवाल के पीछे धार्मिक भावना कम और अर्थ तथा राजनीति की चाल ज्यादा थी। डॉ. जोशी के मुताबिक चमोली में बगवाल खेले जाने का ढंग एकदम अलग था। यहां पाषाण युद्ध का कोई रिवाज नहीं था। इस इलाके में बगवाल मशालों के साथ खेली जाती थी और बगवाल खेलने के समय में भी फर्क था।

करीब दो सदी पहले तक सिर्फ देवीधुरा ही नहीं बल्कि 19 और स्थानों में भी बगवाल की परंपरा थी। पर्वतीय इलाकों में बगवाल की प्रथा को दर्शाने वाली दस दसै, बिसी बगवाल की लोकोक्ति भी खूब गाई जाती थी। कुमाऊं पर ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना होने तक पुलहिंडोला के चमदेवल में बगवाल खेलने की गौरवशाली परंपरा रही है। बगवालीचौड़, गुमदेश, बग्वाली, पोखरी, सिवौली के रावत, चमोली के गांवों में भी बगवाल की प्रथा रही है।

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सैन्य शक्ति परीक्षण का माध्यम थी बगवाल
आज बगवाल को धर्म और परंपरा से जोड़कर देखा जाता है लेकिन इतिहास के आइने में ज्यादातर जगह इसे सैन्य शक्ति परीक्षण का माध्यम भी माना जाता था। इतिहासकार देवेंद्र ओली कहते हैं कि बगवाल का इस्तेमाल सैन्य परीक्षण के लिए भी होता था।

अंतिम बगवाल में विजयी रहने वाला धड़ा वर्षभर के लिए कुमाऊं, गढ़वाल, डोटी आदि इलाकों से कर वसूलने का हकदार हो जाता था। कत्यूरी, चंद, गोरखा और ब्रिटिश काल तक कुमाऊं के सारे गांव माहरा और फर्त्याल के धड़ों में बंटे थे। महाभारत के अनुसार बगवाल खेलने वाले महर, फर्त्याल, रावत, धौनी, देव, ढेक, खड़ायत, अधिकारी, मेहता, रावल आदि ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में भी भाग लिया था। संवाद

शुभ होता है बगवाल का दीदार
बाराही धाम में होने वाले बगवाल का गवाह होना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि बगवाल का दीदार करने वाले लोग बेहद खुशनसीब होते हैं। मां बाराही देवी की कृपा के बगैर न तो कोई बगवाल में भाग ले सकता है और न ही उसे देखने का सौभाग्य हासिल कर सकता है। बीते पांच दशकों के दौरान वर्ष 1997 में 26 मिनट तक बगवाल का युद्ध चला था। तब से आज तक इतनी लंबी अवधि तक बगवाल कभी नहीं हुई।

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कभी अंग्रेजों ने लगाई थी बगवाल पर रोक
प्रदेश में सिर्फ देवीधुरा में ही बगवाल होती है। अंग्रेजों ने बगवाल खेलने पर रोक भी लगाई। इसके चलते इससे जुड़े लोगों के खिलाफ धरपकड़ की कार्रवाई भी की। तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर ट्रेल ने इस दौरान खासा आतंक भी मचाया। इस कारण इलाके की ज्यादातर बगवाल बंद हो गईं लेकिन मान्यता है कि देवीधुरा की बगवाल को बंद कराने के आदेश देने से उसकी आंखों की रोशनी पर असर पडऩे लगा था जिस कारण कमिश्नर ट्रेल ने देवीधुरा की बगवाल को चलते रहने दिया।
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