टनकपुर (चंपावत)।
टनकपुर-जौलजीवी मार्ग पर पहाड़ी दरकने से जनहानि की सोमवार को हुई दूसरी बड़ी घटना ने कार्यदायी ठेकेदार कंपनी, विभाग की कार्यशैली को सवालों के कठघरे में लाकर खड़ा कर दिया है। दो माह पूर्व जनवरी में हुए हादसे से सबक लिया होता तो शायद यह घटना नहीं होती। सवाल उठता है कि पहले हुए हादसे के बाद भी पहाड़ी काटने को सुरक्षात्मक कदम क्यों नहीं उठाए गए। हादसे से श्रमिकों में दहशत फैल गई है।
सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण निर्माणाधीन टनकपुर-जौलजीवी मोटर मार्ग के निर्माण में बाधक बनी अंग्रेज चट्टान को काटना चुनौती बना हुआ है। इस चट्टान को काटते समय दो माह पूर्व तीन जनवरी को भी अचानक पहाड़ी दरकने से कार्यदायी ठेकेदार कंपनी के सुपरवाइज, एक श्रमिक की मलबे में दबकर मौत हो गई थी। तब वहां घटना के वक्त श्रमिकों का लंच टाइम होने से मृतक सुपरवाइजर, श्रमिक ही मलबे की चपेट में आए थे। जबकि हादसे से पहले काफी श्रमिक पहाड़ी के कटान में लगे थे। घटना के बाद पहाड़ी दरकने की वजह को लेकर भी कई सवाल उठे। पुलिस, प्रशासन द्वारा जांच कर कार्रवाई करने की बात कही गई थी, लेकिन हुआ कुछ नहीं। इधर सोमवार हुआ ताजा हादसा भी ठीक पहले वाले घटना स्थल पर ही हुआ है।
यह हादसा भी रॉक ब्रेकर से पहाड़ी में किए छेद में क्रैकामाइट पाउडर भर कर चट्टान को चटकाकर दोनों ओर से पॉकलैंड, जेसीबी मशीन से काटा जा रहा था कि अचानक पहाड़ी दरक गई। ऐसे में सवाल उठता है कि पहले हुए हादसे के बाद कार्यदायी विभाग, ठेकेदार कंपनी ने पहाड़ी काटने में सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किए जबकि पूर्व के हादसे से विभाग, कार्यदायी ठेकेदार कंपनी के इंजीनियरों ने माना था कि आधुनिक तकनीक से पहाड़ कटिंग का कार्य भी सुरक्षित नहीं है। बावजूद इसके पहाड़ी काटने में सुरक्षा इंतजामों की अनदेखी कर हादसे को दावत दी गई।
पहले साले और अब जीजा की ली जान
टनकपुर। टनकपुर-जौलजीवी मार्ग निर्माण में बाधक बनी अंग्रेज चट्टान ने पहले कार्यदायी ठेकेदार कंपनी के पेटी कांट्रेक्टर के सुपरवाइजर साले और अब ठेकेदार जीजा की ही जान ले ली। दो माह तीन जनवरी को हुए हादसे में ऊना हिमाचल निवासी श्रमिक राजेश के साथ ही मृतक ठेकेदार परमानंद जोशी के सगे साले भवानी दत्त भट्ट की मौत हो गई थी और अब दरकी पहाड़ी ने खुद ठेकेदार जोशी की ही जान ले ली।