लाल सिंह प्रथोली, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी।
चंपावत। आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत से टक्कर लेने वाले जांबाज स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में शामिल लाल सिंह प्रथोली आजादी मिलने तक अंग्रेजी हुकूमत की आंखों की किरकिरी बने रहे। चंपावत जिले के सीमांत गुमदेश क्षेत्र के जाख जिंडी में चार अप्रैल 1904 को जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय लाल सिंह प्रथोली ने देश की आजादी के लिए लड़ी गई लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
1918 में प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद 14 अप्रैल 1919 को जनरल डायर के निर्देश पर हुए जलियांवाला बाग गोलीकांड में सैकड़ो भारतीयों के मारे जाने की घटना ने लाल सिंह प्रथोली के जीवन को ही बदल दिया। इसके बाद वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में कूद गए। उन्होंने 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। इतिहासकार डॉ. प्रशांत जोशी के अनुसार अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रियता के चलते लाल सिंह प्रथोली के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया। अंग्रेजी हुकूमत की हिदायत थी कि यदि लाल सिंह पकड़ में आए और भागने का प्रयास करे तो उसे गोली मार दी जाए। लेकिन लाल सिंह अंग्रेजो के हाथ नहीं आए और लगातार दो वर्षो तक भूमिगत रहकर आजादी की लड़ाई में योगदान देते रहे।
अंग्रेजी सरकार की आंख की किरकिरी बन चुके लाल सिंह प्रथोली पर दस हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था। जिसकी अदायगी के लिए तब उन्होंने अपने खेत खलिहान तक बेच दिए थे। सेनानी के पुत्र गुमान सिंह प्रथोली क अनुसार 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी मिलने के बाद वह विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों के विकास में जुटे रहे और 25 दिसंबर 1971 को 68 वर्ष की आयु में उनका देहावसान हो गया। क्षेत्र में आज भी लाल सिंह प्रथोली की वीर गाथा का बयान होता है।
प्रथम विश्व युद्ध के समय महज 10 साल के थे लाल सिंह
चंपावत। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के लाल सिंह प्रथोली के परिजनों के अनुसार वर्ष 1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ, उस समय लाल सिंह की उम्र महज दस साल थी। वह बचपन से ही गोरी सरकार के विरोधी थे। बालक लाल सिंह जब जाड़ों की रातों में बुजुर्ग लोगों से गोरी सरकार के अन्याय और अत्याचार की बातें सुनकर उनसे बदला लेने की बातें किया करते थे। संवाद