चंपावत। हरेला पर्व पर शनिवार को चंपावत जिले में 50000 से अधिक पौधों को लगाने का लक्ष्य रखा गया है लेकिन पूर्व के अनुभव और आंकड़े बताते हैं कि पौधों को लगाना जितना आसान है, उतना ही कठिन उन्हें बचाना है। वन विभाग की ओर से पिछले तीन वर्षों में लगाए गए पौधों में से औसतन तीन में से एक पौधा अकाल मौत का शिकार बन रहा है। पौधों को नुकसान की बड़ी वजह देखरेख की कमी और जानवर भी हैं जो इन पौधों को चट कर देते हैं क्योंकि इन पौधों की घेरबाड़ नहीं की होती है।
चंपावत वन प्रभाग के छह रेंजों में 65980.12 हेक्टेयर आरक्षित, 34375.95 पंचायती, 22815.70 हेक्टेयर सिविल वन हैं। वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक नवंबर 2019-20 से 2021-22 तक 1640.59 हेक्टेयर वन भूमि पर 14.27 लाख पौधे लगाए गए। इन्हें रोपने में 1.31 करोड़ रुपये का खर्च आया लेकिन इनमें से 4.80 लाख पौधे (करीब 33.67 प्रतिशत) नष्ट हो गए। देखरेख की कमी समेत कई कारणों से इन पौधों की अकाल मौत हो गई। सामान्य रूप से दो पौधों के बीच में दो मीटर का फासला रखा जाता है।
पिछले तीन वर्षों में लगे पौधों के आंकड़े
वर्ष लगाए पौधों की संख्या बर्बाद हुए पौधे
2019-20 770420 308168
2020-21 411002 123301
2021-22 246012 49202
कुल योग 1427434 480671
सामान्य तौर पर लगाए गए पौधों में से 90 फीसदी सुरक्षित रहने चाहिए। जानवरों से पौधों की सुरक्षा के लिए झाड़ियों, कांटों आदि तरीके से घेरबाड़ कर बचाव का वन विभाग प्रयास करता है। पौधों के विकास के लिए सभी रेंजों को निराई-गुड़ाई से लेकर सुरक्षा तक का जिम्मा दिया जाता है। इसके बावजूद मौसम, आपदा आदि कारणों से पौधों का नुकसान लक्ष्य से ज्यादा रहता है। विभाग पुरानी खामियों से सीख लेकर बेहतर प्रबंध करेगा। - रमेश चंद्र कांडपाल, डीएफओ, चंपावत वन प्रभाग।
प्रतिस्पर्धा से पौधों की परवरिश की कवायद
चंपावत। पौधों को अकाल मौत से बचाने के लिए परवरिश की योजना बनेगी। स्कूलों में लगाने वाले पौधों को बचाने की जिम्मेदारी छात्र-छात्राओं को दी गई है। छात्र-छात्राएं इन पौधों को अपने माता-पिता के नाम पर गोद लेंगे। उनके माध्यम से रोपे गए पौधों का नामकरण के बाद नियमित अंतराल में इन पौधों की परवरिश की समीक्षा की जाएगी। प्रतियोगिता के जरिये पौधों की बेहतर परवरिश वाले छात्रों को पुरस्कृत किया जाएगा। पौधा लगाने वाले विभाग के नाम से वाटिका बनेगी। इसकी जिम्मेदारी संबंधित महकमे को लेनी होगी।
नहीं बच सका मियावाकी जंगल
चंपावत। चार साल पहले चंपावत के गौड़ी सड़क के नजदीक मियावाकी तकनीक से मिश्रित वनों को उगाने के लिए पौधरोपण हुआ। जिला प्रशासन ने एक स्वयंसेवी संस्था की मदद से फल, औषधीय, जल संरक्षण सहित 20 प्रजातियों के 35000 पौधे लगाए लेकिन चार साल बाद 50 प्रतिशत पौधे भी नहीं बचे हैं। लोगों का कहना है कि देखरेख की कमी की वजह से अधिकतर पौधे नष्ट हो गए।
डीएफओ रमेश चंद्र कांडपाल का कहना है कि मियावाकी जंगल की देखरेख का जिम्मा वन विभाग का नहीं है। मियावाकी तकनीक में आधे से एक फीट की दूरी पर पौधे रोपे जाते हैं। इसमें विशेष रूप से तैयार खाद का उपयोग होता है। पौधे पास लगने से मौसम की मार का प्रभाव कम पड़ने समेत गर्मियों में भी पौधों के हरे बने रहने की संभावना ज्यादा रहती है लेकिन चंपावत में यह तकनीक भी फेल रही।
पौधरोपण कर कमाई कर रहे बुजुर्ग टीकाराम
चंपावत। स्वांला गांव के 80 साल के टीकाराम भट्ट के लिए पौधरोपण जुनून है। पिछले दो दशक में उन्होंने अपनी 35 नाली जमीन पर पौधे लगा न केवल पर्यावरण की हिफाजत की बल्कि आय का जरिया भी खोजा है। बांज, देवदार, तेजपात, माल्टा, अखरोट, पुलम आदि का बगीचा तैयार करने वाले भट्ट बताते हैं कि पौधे लगाने की आदत बचपन से ही थी लेकिन बढ़ती गर्मी से उन्हें पर्यावरण का महत्व समझ आया। फिर उन्होंने परिवार की मदद से नियमित रूप से पौधे लगाए। विभिन्न प्रजातियों के सवा दो सौ से ज्यादा पेड़ों से सालभर में 85000 रुपये की आय भी अर्जित कर रहे हैं। चंपावत के रेंजर बीएम टम्टा कहते हैं कि टीकाराम की मेहनत को देखते हुए उन्हें निशुल्क पौधे दिलाए जाते हैं।