गोपेश्वर में आयोजित कार्यक्रम में बनी गहमा गहमी की स्थिति
प्रशासन के अनुरोध पर कुछ आंदोलनकारी कार्यक्रम में वापस आए
विरोध को देखते हुए विधायक और जिला पंचायत अध्यक्ष भी बीच कार्यक्रम से लौटे
उत्तराखंड राज्य गठन की रजत जयंती पर गोपेश्वर में आयोजित सम्मान समारोह उस समय भावनात्मक और विवादित हो उठा, जब राज्य निर्माण के लिए लाठियां खाने, जेल जाने और महीनों तक आंदोलन करने वाले आंदोलनकारियों का दर्द मंच से छलक पड़ा। कई आंदोलनकारियों ने जहां मंच से अपनी पीड़ा व्यक्त की, वहीं कुछ ने समारोह का बहिष्कार कर प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया।
शनिवार को पीजी कॉलेज गोपेश्वर के सभागार में प्रशासन की ओर से राज्य आंदोलनकारियों के लिए सम्मान समारोह आयोजित किया गया था। कार्यक्रम के दौरान मंच से वरिष्ठ आंदोलनकारी गायत्री गैरोला ने कहा कि उत्तराखंड राज्य की लड़ाई देहरादून, हरिद्वार या ऊधमसिंह नगर जैसे शहरों के लिए नहीं लड़ी गई थी। यह आंदोलन गांवों की पीड़ा दूर करने के लिए था लेकिन आज गांवों की दशा पहले से भी बदतर हो गई है। नेताओं, ठेकेदारों और चंद अधिकारियों की मौज है, जबकि जनता अब भी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।
आंदोलनकारी नंदन बिष्ट ने कहा कि जब हम उत्तर प्रदेश में थे तो मूल निवासी कहलाते थे लेकिन राज्य बनने के बाद स्थायी निवासी बनकर रह गए। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, पलायन और वन्यजीव नीति को लेकर अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। उन्होंने कहा कि जब तक मूल निवास नीति लागू नहीं होती, वे किसी भी तरह का सम्मान स्वीकार नहीं करेंगे।
आंदोलनकारी अयाजुद्दीन सिद्दीकी ने भी अपनी पीड़ा मंच से साझा की। आंदोलनकारियों के विरोध के चलते समारोह के दौरान गहमा-गहमी की स्थिति बन गई। कई आंदोलनकारी कार्यक्रम स्थल से उठकर बाहर चले गए। उन्हें मनाने के प्रयास में बदरीनाथ विधायक लखपत बुटोला, जिला पंचायत अध्यक्ष दौलत सिंह बिष्ट और अन्य जनप्रतिनिधि भी सभागार से बाहर चले गए।
बाद में प्रशासन की ओर से समझाने-बुझाने पर कुछ आंदोलनकारी वापस लौटे, जिन्हें जिलाधिकारी ने सम्मानित किया। हालांकि कई आंदोलनकारियों ने अपना बहिष्कार जारी रखा और कार्यक्रम के समापन तक नहीं लौटे।
-इंसेट
निमंत्रण नहीं देने का लगाया आरोप
चमोली निवासी राज्य निर्माण आंदोलनकारी गोविंद सिंह रावत का कहना है कि उन्हें इस कार्यक्रम में बुलाया ही नहीं गया। प्रशासन से किसी ने उन्हें सूचना तक नहीं दी। उन्हें कार्यक्रम के बारे में शनिवार दोपहर को पता लगा। वहीं, आंदोलनकारी चंद्रकला बिष्ट ने कहा कि आंदोलनकारियों को निमंत्रण देने में खानापूर्ति की जाती है, न कोई फोन करता है न कोई कार्ड भेजा जाता है। एक पन्ने पर दो लाइन लिखकर भेजा जाता है वह भी सही पते पर नहीं आता। जब तक सम्मान से नहीं बुलाया जाएगा तब तक वे कोई सम्मान नहीं लेंगी।