हल्दी की खेती के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं होती। पहाड़ की जलवायु हल्दी की उपज के अनुकूल है। बाजार में हल्दी का अन्य उपजों से मूल्य भी ज्यादा मिलता है। ऐसे में किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती की ट्रेनिंग दी जाए, उन्हें उन्नत बीज, बढ़िया खाद सिंचाई के साधन मुहैया कराए जाएं तो उपज में बढ़ोत्तरी हो सकती है। पहाड़ पर खुशहाली आ सकती है।
खुद काश्तकार इस बात को मानते हैं। किसान राकेश रतूड़ी, राजेंद्र सगोई, सुनील प्रसाद, मलक नेगी, बृजेश बिष्ट आदि का कहना है कि सरकार अगर हल्दी, मिर्च और अदरक की खेती के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में काश्तकारों को उन्नत बीज मुहैया कराए तो तस्वीर बदल सकती है। खेती की वैज्ञानिक तकनीक का प्रचार-प्रसार सोने पर सुहागा साबित हो सकता है।
अभी क्या है स्थिति
ग्रामीण क्षेत्रों में हल्दी के साथ अदरक और मिर्च की खेती हो रही है, लेकिन परंपरागत तरीके से। हल्दी उगाने के लिए बलुई दोमट मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त मानी जाती है। क्षेत्र के सिमली, सेनू, चमोला, सिमल्ट, कनोठ, गैरोली, डिम्मर और थराली के कुलसारी, चेपड़ों, लोल्टी, कोठी समेत आदिबदरी के नौना, पयां, आली, मजियाड़ी, तलोंजा, नगली, ढमकर आदि स्थानों पर काश्तकार हल्दी, मिर्च, अदरक और अरवी की खेती कर रहे हैं।
किस तरह लाभदायक है हल्दी-
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शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का विकास
खून की सफाई में कारगर
चोट लगने पर सूजन कम करने में
औषधीय इस्तेमाल बड़े पैमाने पर
घरों में शुभ कार्यों में
जंगली जानवर भी नहीं करते नुकसान
पहाड़ी क्षेत्रों में खेती-बाड़ी का सबसे ज्यादा नुकसान बंदर करतेे हैं। लेकिन हल्दी को बंदर, जंगली सुअर जैसे जानवर कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। इसी वजह से हल्दी की खेती को स्थानीय ग्रामीण तवज्जो दे रहे हैं।