आजादी की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने वाले श्रीकोट (गौचर) गांव के 103 वर्षीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बख्तावर सिंह बिष्ट के निधन से क्षेत्र में शोक की लहर है। वे चमोली जिले में एक मात्र जीवित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। उन्होंने आजादी की लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
18 जनवरी 1918 को जन्मे बख्तावर सिंह बिष्ट में बचपन से ही देश भक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी। इसी कारण वे 1940 में मात्र करीब 21 साल की उम्र में सेना में भर्ती हो गए। अंग्रेजी हुकूमत की गुलामी की घुटन का उन्होंने विरोध करना शुरू किया। उनके विरोध को देखते हुए वर्ष 1944 में अंग्रेजी सरकार ने उनको गिरफ्तार किया और कलकत्ता की जेल में भेज दिया था, लेकिन आजादी की ज्वाला उनके मन में धधकती रही और फिर वे नेताजी सुभाषचंद्र बोस के आह्वान पर आजाद हिंद फौज में गए। देश को आजादी मिलने के बाद वे पीएससी में भर्ती हुए तथा 1974 में सेवानिवृत्त हो गए। आजादी के इस नायक को कर्णप्रयाग तहसील प्रशासन की ओर से राष्ट्रीय पर्वों पर सम्मानित किया जाता रहा है। 15 अगस्त 2020 को सम्मानित होते समय उन्होंने आजादी की लड़ाई के संस्मरण सुनाए थे। हालांकि उसके बाद स्वास्थ्य कारणों से प्रशासन की ओर से उनको घर पर जाकर ही सम्मानित किया जाता रहा। गौचर के पूर्व पालिकाध्यक्ष मुकेश नेगी, सुनील पंवार, अरुण मिश्रा, एलपी लखेड़ा का कहना है कि आजादी के इस महानायक के निधन से अपूरणीय क्षति हुई है। वे हमारे आदर्श थे।
निधन पर शोक जताया
कर्णप्रयाग। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बख्तावर सिंह बिष्ट के निधन पर लोगों ने गहरा दुख जताया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं उत्तराधिकारी संगठन चमोली के सदस्यों ने श्रद्धांजलि अर्पित कर पुण्य आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। इस मौके पर संगठन के अध्यक्ष गोविंद तोपाल, त्रिलोक खत्री, हरीश रावत, नरेंद्र कंडेरी, अनसुया सजवाण, देवेंद्र खत्री, विक्रम झिंकवाण मौजूद थे। संवाद