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फायर सीजन में उग आए नए पौधे

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लॉकडाउन की वजह से पेड़ पौधे भी खुलकर ‘सांस’ ले पा रहे हैं। अच्छी खबर यह है कि जिले में फायर सीजन के दौरान जंगलों में आग लगने की एक भी घटना नहीं हुई। उल्टे नए पौधे उग आए हैं। अधिकारी मान रहे हैं कि इससे जिले में वन घनत्व बढ़ा है।
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उत्तराखंड के पौड़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी सहित कुमाऊं के बागेश्वर और अल्मोड़ा जिलों में पिछले सालों तक गर्मियों में हजारों हेक्टेयर जंगल आग की भेंट चढ़ जाते थे। इससे वनस्पतियों और जीव जंतुओं को भी नुकसान पहुंचता था। लेकिन इस बार तस्वीर बदली हुई है।
बांज, बुरांस, फनियाट, अंगियार, काफल आदि चौड़ी पत्ती वाले पेड़ राहत महसूस कर रहे हैं। पर्यावरण के जानकारों और अधिकारियों का मानना है कि अगर जंगलों में आग न लगी और लगातार बारिश का सिलसिला जारी रहा तो गढ़वाल-कुमाऊं के जंगलों के साथ ही उनमें पाई जाने वाली दुर्लभ प्रजाति की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी।
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जंगलों के खालों, धारों में आने लगा पानी
लॉकडाउन के दौरान लोग घरों में रहे। मानवीय गतिविधि रुकने से जंगलों में आग नहीं लगी। जमीन पर गिरे बीजों ने पौधों का रूप ले लिया है। वन दारोगा प्रकाश नेगी बताते हैं कि कर्णप्रयाग तहसील के गैरोली, पुडियाणी, नंदासैंण सहित अन्य जंगलों में पानी के स्रोतों को नया जीवन मिला है। इन जंगलों में करीब 10 प्रतिशत खालों और धारों में पानी आने लगा है। जंगली जानवरों को भी पर्याप्त मात्रा में भोजन मिल रहा है। छोटे जीव भी बचे रहे हैं।
वनों में मानव हस्तक्षेप में कमी आने से पूरे उत्तराखंड के जंगलों को फायदा हुआ है। यह हमारे वातावरण के लिए आने वाले समय में मील का पत्थर साबित होगा। लॉकडाउन के चलते वनों का अनियोजित दोहन भी रुका है। जंगलों में पेड़ों से पककर गिरने वाले बीजों से हमारे जंगलों के घनत्व में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई है।
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-प्रदीप गौड़, रेंजर वन विभाग कर्णप्रयाग।
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