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किशन महिपाल के गीतों पर देर रात तक थिरके

Sat, 19 Nov 2016 09:21 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चमोली।
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programme - फोटो : अमर उजाला
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औद्योगिक विकास एवं सांस्कृतिक विकास मेले की पांचवीं सांस्कृतिक संध्या लोकप्रिय गायक किशन महिपाल और साथी कलाकारों के नाम रही। किशन महिपाल के स्याली बंपाली, मैं मिलण ए तू नीति गमशाली..., रानीखेता रामढोला घमघमा कन बजैनि..., फ्यूंलड़िया त्वे दिखे के औंदु ये मन मा, तेरू मेरू साथ छये पैला जनम मां... पर पांडाल में दर्शक देर रात तक थिरकते रहे।
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गायक किशन महिपाल के गीतों को सुनने के लिए पंडाल से बाहर भी दर्शकों की भारी भीड़ जमा रही। किशन महिपाल ने कृष्ण जागर हाथ खेलला, कृष्ण बाल गोविंदा जी... की पहली प्रस्तुति से दर्शकों को भाव विभोर कर दिया। ओ भाना रंगीली भाना, भाना हो रंगीली... और किंगरी का छाला घुघुती... गीतों पर थिरकते दर्शक एक के बाद दूसरी प्रस्तुति सुनने को आतुर दिखे।

लक्ष्मी प्रसाद पुरोहित के संचालन में रोंग्पा गीत लयां फुली पयां... की प्रस्तुति दी। दिल्ली में रह रही माईथान की गायिका आन्या बिष्ट ने अफि दे सजाई मां, मेहंदी मेरा हाथड्यूं दी... गीत और हास्य कलाकार नवीन सेमवाल ने रोचक हास्य प्रस्तुति से दर्शकों को खूब गुदगुदाया।
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इससे पूर्व रंत रैबार सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था, झंकार सांस्कृतिक मंच बागेश्वर आदि टीमों ने सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति दी। हालांकि पांचवीं सांस्कृतिक संध्या में इलाहाबादी कव्वाली क्लब का कव्वाली कार्यक्रम भी तय था, लेकिन टीम के ने पहुंचने से कार्यक्रम नहीं हो पाया।


सूटो आई जमानु, साड़ियूं की दुकान पर मकड़जाल लग्यां...

शनिवार को मेला पांडाल में आयोजित कवि सम्मेलन में ख्याति प्राप्त कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से विलुप्त होते रीति रिवाज और लोक परंपरा तथा लोक जीवन पर आधारित कविताओं की प्रस्तुति दी। कलश लोक संस्कृति चैरिटेबल ट्रस्ट रुद्रप्रयाग की ओर से आयोजित कवि सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों से आए रचनाकारों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की।

कवि सम्मेलन की शुरुआत ओम प्रकाश सेमवाल ने हैरी धरती का गीत नीला आसमान का गीत से की। श्रीनगर के दीपक रावत ने सीमा पार पर तैनात जवानों के मनोबल को बयां करती धन धन छन वु बीर सिपै, धन धन बीर जवान, मुरली दिवान ने सरकार भी देणे लगी, सरकार कु दोष नि, खाण वालु खाणे लग्यूं तति मां संतोष नि... से मनुष्य के लालची स्वभाव को व्यक्त किया।

तेजपाल निर्मोही ने विसरग्यां हम अपणि रीति रिवाज, बृजेश रावत ने सूटो आई जमानु, साड़ियूं की दुकान पर मकड़जाल लग्यां रचना से विलुप्त होते रहन-सहन और रिवाजों पर तंज कसा। कवि अरुण चमोली ने देश के गद्दरों को कुचल चलो, सीना तानकर बीरों सा मचलकर चलो कविता से देश प्रेम का जज्बा दिखा। जय विशाल गढ़देशी ने कबरि क्वीदार कबरि क्वीदार बणौणि सरकार और सुधीर बर्त्वाल ने बगाणा रां गंगा मनख्याति रचना की प्रस्तुति दी।
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