जिले के वन सरपंचों ने सरकार से वन पंचायतों को अधिकार संपन्न बनाने की मांग की है। उन्होंने इस संबंध में मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा है।
सरपंचों का कहना है कि 2001 और 2005 में वन पंचायत नियमावली में बदलाव कर वन पंचायतों को वन विभाग के अधीन कर दिया गया था। इससे ग्रामीण वनों से जुड़े हक हकूकों से वंचित हो गए। यही कारण है कि लोग अब वन संरक्षण के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं।
वन अधिनियम के तहत वन विभाग आरक्षित वन क्षेत्र में ही वन पंचायतें गठित कर सकता है। जबकि उत्तराखंड में सभी वन पंचायतें सिविल में हैं। जिसके चलते वन विभाग का वन पंचायतों पर नियंत्रण उसकी सीमा से बाहर बना हुआ है। इसलिए वन पंचायत नियमावली को वनाधिकार कानून 2006 के तहत जारी किया जाए। वन पंचायतों को सामुदायिक वन का दर्जा दिया जाए और अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी अधिनियम के तहत सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति के रूप में मान्यता दी जाए।
ज्ञापन भेजने वालों में सरपंच वन पंचायत निजमुला जितेंद्र सिंह कठैत, वन सरपंच पुडियाणी मदन सिंह, वन पंचायत दियारकोट महेंद्र सिंह, सुरेंद्र रावत, प्रकाश सिंह यशवंत पंवार, प्रदीप भंडारी, पुष्कर सिंह, बहादुर सिंह आदि शामिल थे।