अब शीतकाल में बदरीनाथ धाम सेना के हवाले रहेगा। धाम के कपाट बंद होने के बाद व्यवसायी और देश के अंतिम गांव माणा से भोटिया जनजाति के ग्रामीण निचले क्षेत्रों में लौट जाते हैं, जिसके बाद सेना और आईटीबीपी के जवान ही सीमा के साथ ही बदरीनाथ धाम की सुरक्षा भी करते हैं।
बदरीनाथ धाम चीन सीमा क्षेत्र में है। यहां माणा गांव में सेना और आईटीबीपी के कैंप हैं। शीतकाल में बदरीनाथ क्षेत्र बर्फ के आगोश में समा जाता है। इस दौरान भी यहां सेना की मौजूदगी रहती है। प्रतिवर्ष धाम के कपाट खुलने और बंद होने पर सेना की ओर से बदरीनाथ में निशुल्क भंडारे का आयोजन किया जाता है। वहीं, गढ़वाल स्काउट की ओर से भी धाम में प्रतिवर्ष निशुल्क भंडारे का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष भी स्काउट के कर्नल हिमांशु मिश्रा और मेजर भगवती प्रसाद पुरोहित की देखरेख में करीब दस हजार तीर्थयात्रियों को भंडारे में भोजन कराया गया।
जोशीमठ (चमोली)। बदरीनाथ धाम के कपाट बंद होते ही धाम में स्थित बामणी और माणा गांव में तीर्थयात्रियों, पर्यटकों और ग्रामीणों की चहल-पहल भी थम गई है। दोनों गांवों में सन्नाटा पसर गया है। यहां के ग्रामीण छह माह तक बदरीनाथ धाम की सेवा-भक्ति में लगे रहते हैं।
बामणी और माणा बदरीनाथ से जुड़े हकहकूकधारियों के गांव हैं। यहां के ग्रामीण धाम के कपाट खुलने के साथ ही अपने मवेशियों के साथ धाम में पहुंच जाते हैं। धाम में ग्रामीण आलू, राजमा, फाफर, गोभी और ऊन का उत्पादन करते हैं। ग्रामीण बदरीनाथ और घंटाकर्ण की सेवा भक्ति में लगे रहते हैं।
कपाट बंद होने पर बामणी गांव के ग्रामीण पांडुकेश्वर तथा माणा गांव के भोटिया जनजाति के ग्रामीण जिले के गोपेश्वर, नैग्वाड़, घिंघराण, सिरोखोमा, सेंटुणा आदि स्थानों में निवास करते हैं। इन लोगों को ही बदरीनाथ के भंडार गृह की जिम्मेदारी दी जाती है। माणा के ग्रामीणों को बदरीनाथ धाम के रक्षक के रूप में जाना जाता है।