गुरुवेंद्र नेगी
गोपेश्वर। बदरीनाथ धाम में शीतकाल के दौरान 22 साधु-संत तपरत रहेंगे। तहसील प्रशासन ने साधुओं को धाम में तपस्था करने की अनुमति दी है। बदरीनाथ परिसर में भारी बर्फबारी के बीच साधु तपस्यारत रहते हैं।
आदिकाल से ही बदरीनाथ क्षेत्र ऋषि मुनियों की तपस्थली रही है। प्रतिवर्ष श्री बदरीनाथ के कपाट बंद होने के पश्चात छह माह तक साधु-संत यहां तपस्या में लीन रहते हैं। प्रतिवर्ष मंदिर के कपाट बंद होने के बाद यह समूचा क्षेत्र मानव विहीन हो जाता है। सीमा क्षेत्र होने के चलते यहां भारतीय सेना के साथ ही आईटीबीपी के जवान ही मुस्तैद रहते हैं। भारी बर्फबारी हुई तो पुलिस थाना भी हनुमान चट्टी चौकी में शिफ्ट हो जाता है, लेकिन भगवान के कुछ बंदे ऐसे भी हैं जो कड़ाके की सर्दी में भी धाम में तपस्या में लीन रहते हैं। इसके लिए स्थानीय प्रशासन द्वारा जांच पड़ताल के बाद ही साधु-संतों को यहां रहने की अनुमति दी जाती है।
इन्हें मिली तप की अनुमति
दिगंबर गंगा भारती, अमृतानंद गिरी, शिव प्रसाद, विजयराम चैतन्य, भाष्करानंद पुरी, बह्मचारी भागवत दास, सुखराम त्यागी, पी शंकर नंबूदरी, प्रकाश नंद, धर्मराज मौनी बाबा, स्वामी रंजीत साधु, विश्वनाथ रामचंद्र, राघवेंद्र स्वामी, मदन मोहन, चंद्रेश्वर भारती, दत्त चैतन्य, शैलेश ध्यानी, दीन दयाल दास, शीतल दास, महर्षि साधना, लवदास, बद्री प्रसाद।
जांच पड़ताल के बाद अभी तक 22 लोगों को शीतकाल में यहां रहने की इजाजत दी गई है। चार लोगों की जांच पड़ताल के लिए पुलिस को लिखा गया है। इसके अलावा स्थानीय प्रशासन भी शीतकाल में चेकिंग के लिए यहां आता है। साधु लोग साधना के लिए यहां रुकते हैं।
-एके नौटियाल, एसडीएम, जोशीमठ
बदरीनाथ क्षेत्र आदिकाल से ही देवताओं, ऋषि-मुनियों की धरती रही है। यहां कण-कण में भगवान विराजमान हैं। कई साधु-संत विश्व कल्याणार्थ शीतकाल में यहां तपरत रहते हैं। वे कड़ाके की ठंड में कभी अपनी गुफाओं में तो कभी श्री बदरीनाथ मंदिर परिसर में तपस्या में लीन रहते हैं। कड़ाके की ठंड भी आस्था को डिगा नहीं पाती है।
अनुसूईया प्रसाद भट्ट, पूर्व अध्यक्ष, बीकेटीसी।