जोशीमठ। सलूड़ गांव में शुक्रवार को विश्व धरोहर रम्माण मेले का आयोजन हुआ। पारंपरिक वाद्ययंत्र ढोल-दमाऊं की थाप पर 18 तालों पर रामायण का मंचन देख दर्शक भी अभिभूत हो गए। इस प्राचीन धार्मिक आयोजन को देखने के लिए सलूड़ गांव में भारी संख्या में दर्शकों की भीड़ उमड़ी। इस दौरान भूमियाल देवता की विशेष पूजा भी हुई। मेले में पहाड़ की संस्कृति की झलक देखने को मिली।
प्रतिवर्ष सलूड़ गांव में आठवीं शताब्दि से चले आ रहे रम्माण (रामायण) मेले का आयोजन धूमधाम से किया जाता है। शुक्रवार को सुबह ग्यारह बजे से सलूड़-डुंगरा गांव में रम्माण मेले का आयोजन हुआ। सबसे पहले ढोल-दमाऊं की थाप पर भूमियाल देवता पश्वा पर अवतरित हुए। देवता ने मेले में पहुंचे श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया। इसके बाद 18 तालों पर मुखौटा नृत्य हुआ। इस दौरान भगवान श्रीराम के जन्मदिन से लेकर रावण वध तक का वृत्तांत जागर और मुखौटा नृत्य के माध्यम से दिखाया गया। मेला संरक्षक कुशल सिंह भंडारी और अध्यक्ष कुलदीप सिंह चौहान और भरत सिंह कुंवर ने बताया कि आठवीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य ने हिंदू धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए रम्माण का आयोजन किया था। तब से ग्रामीण इस प्राचीन आयोजन को पूरे विधि-विधान से करते आ रहे हैं।