बागेश्वर। जिले के पिंडारी ग्लेशियर से सटे इलाके अतीत में पूरे छह माह तक बर्फ से ढके रहते थे। अक्तूबर अंत या नवंबर शुरुआत से बर्फबारी का सिलसिला शुरू हो जाता था, जो मार्च तक चलता था। पिछले कुछ वर्षों से बर्फबारी में कमी आई है। इसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग को कारण माना जाता रहा है।
जिले के पिंडारी ग्लेशियर क्षेत्र से सटे खातीगांव, जांतोली, वाछम, सोराग, बोरबलड़ा, कुंवारी, समडर, बोराचक झारकोट,कालों, उंगियां, किलपारा तीख, डौला, धूर समेत तमाम इलाकों के लोग बर्फबारी के कारण केवल ग्रीष्मकाल में छह महीने अक्तूबर से सितंबर अंत तक उच्च हिमालय क्षेत्र में निवास करते थे। शेष छह महीने अक्तूबर से मार्च तक घाटी वाले इलाकों में निवास करते थे। आज भी उच्च हिमालय क्षेत्र के भेड़ पालक शीतकाल में छह महीने तक घाटी वाले इलाकों और मैदानी क्षेत्रों में भेड़ों के जत्थों के साथ प्रवास करते हैं।
इधर अब पहले जैसी बर्फबारी देखने को नहीं मिलती है। इस बार भी नवंबर का पहला पखवाड़ा गुजरने को है बर्फबारी के दर्शन नहीं हुए हैं। पिछले वर्ष दिसंबर माह में पहला हिमपात हुआ था। अब बर्फबारी होती भी है तो पहले की अपेक्षा काफी कम होती है। इस बार अब तक पहली बर्फबारी का इंतजार है।
छह महीने का राशन कर दिया जाता स्टोर
बागेश्वर। शीतकाल को देखते हुए सरकार भी उच्च हिमालयी क्षेत्र के लिए अलग से इंतजाम करती है। छह महीने का राशन पहले ही उच्च हिमालय क्षेत्र के गोदाम में पहुंचा दिया जाता है। इस बार भी अक्तूबर शुरूआत में ही उच्च हिमालयी क्षेत्र में पहुंचा दिया गया था। संवाद