बागेश्वर। अनवाल (भेड़ पालक/चरवाहे) मैदानी क्षेत्र से हिमालय की ओर लौटने लगे हैं। यह लोग शीतकाल में प्रवास पर तराई-भाबर क्षेत्र में जाते हैं और ग्रीष्मकाल में बुग्यालों की ओर लौटते हैं। अनवाल लोग ग्रीष्मकाल में छह महीने हिमालयी क्षेत्र से सटे इलाकोें में भेड़ चराएंगे।
गौलापार (हल्द्वानी) से 23 दिन पहले 700 भेड़ लेकर चला अनवालों का दल विभिन्न पड़ावों से होकर शुक्रवार को बागेश्वर पहुंचा। जिले में तीन पड़ाव और पार करने के बाद दल पिथौरागढ़ जिले की सीमा में प्रवेश कर जाएगा। दल को मुनस्यारी पहुंचने में करीब 10 दिन का समय और लगेगा। जुलाई तक मुनस्यारी में रहने के बाद यह दल जोहार के बुग्यालों की ओर प्रस्थान करेगा। सितंबर के अंत में बुग्यालों से उतरकर नवंबर में फिर से भाबर की यात्रा शुरू हो जाएगी।
अनवाल गर्मियों में मुनस्यारी के बुग्याल और शीतकाल में गौलापार के जंगलों में रहते हैं। नवंबर में अनवालों का दल भेड़ों का झुंड लेेकर मुनस्यारी से गौलापार की यात्रा पर निकल पड़ता है। केवल रातिरकेटी गांव कपकोट के मलक सिंह का दल ही बागेश्वर जिले से होकर गुजरता है। मलक पिछले पांच दशक से चरवाहे का काम कर रहे हैं। उनके दल में भेड़ों के साथ तीन प्रजातियों के कुत्ते, सामान ढोने के लिए कई घोड़े और कर्मचारी शामिल रहते हैं। दिसंबर में गौलापार पहुंचने के बाद यह दल तीन महीने वहां के जंगलों में गुजारता है। मार्च के दूसरे पखवाड़े में फिर से मुनस्यारी के लिए रवानगी होती है। संवाद
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इन पड़ावों से होकर गुजरता है दल
बागेश्वर। पहाड़ से मैदान की यात्रा के लिए दल वर्षों पुराने मार्ग से गुजरता है। मुनस्यारी के बाद दल का पहला पड़ाव कालामुनि रहता है जहां से रात्तापानी, ककड़सिंह बैंड, बाखड़ धार होकर बागेश्वर की सीमा में प्रवेश कर अनवाल झोपड़ा में रुकते हैं। झोपड़ा से कपकोट, हरसीला, बिलौना, काफलीगैर, कनगाड़छीना में रुकते हुए अल्मोड़ा जिले की सीमा में जाते हैं। वहां बिनसर, धौलछीना, पत्थरखानी, झांकरसैम, धुड़म, दुबरेली, डोल आश्रम, मोरनौला, नाये, पतलोट, धरमघर, बनोलिया, हरीशताल, ककोड़, डेढ़गांव, चौघान होकर अंतिम पड़ाव सूर्या मंदिर में रहता है जहां से दल गौलापार के जंगलों में पहुंचता है। संवाद
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समय बदलने के साथ बढ़ रही परेशानी
बागेश्वर। पहले अनवाल बेफिक्र होकर यात्रा करते थे लेकिन अब उनकी चुनौतियां भी बढ़ने लगीं हैं। अनवाल मलक सिंह, पुष्कर सिंह बताते हैं कि रास्ते में अराजक तत्वों के साथ कुछ वन कर्मी भी उनकी परेशानी बढ़ाते हैं। जंगल में जिन स्थानों पर वह दशकों से अपना पड़ाव बनाते रहे हैं, वहां रुकने पर वन विभाग के कर्मचारी धमकाते हुए परमिट दिखाने के लिए कहते हैं। सरकार भेड़, बकरी पालन को बढ़ावा देने की बात करती है लेकिन इन भेड़ पालकों को सरकारी योजनाओं का लाभ तक नहीं मिल पाता है। सुरक्षा और सुविधाएं न मिलने के कारण नई पीढ़ी इस काम से मुुंह मोड़ने लगी है। संवाद
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ऊन की मांग हुई कम, भेड़ बेचकर चलाते हैं खर्चा
बागेश्वर। अनवालों की आजीविका का मुख्य साधन भेड़ का मांस और उससे निकलने वाला ऊन है। हालांकि अब भेड़ के ऊन की मांग काफी कम हो गई है। इस कारण अनवालों की आजीविका भेड़ के मांस पर ही निर्भर होकर रह गई है। अनवाल पुष्कर सिंह बताते हैं कि सालभर में करीब ढाई सौ भेड़ें बिकतीं हैं जिनसे होने वाली आय से उनके परिवारों का खर्चा चलता है। संवाद
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एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए चरवाहों को परमिट बनाना चाहिए। परमिट में जानवरों की संख्या और रुकने वाले पड़ाव की जानकारी होने पर उन्हें किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। अगर कहीं पर चरवाहों को दिक्कत हुई तो उसका संज्ञान लिया जाएगा। उनकी परेशानी को दूर किया जाएगा। - हिमांशु बागरी, डीएफओ, बागेश्वर।