गरुड़ (बागेश्वर)। हरेला पर्व उत्तराखंड के प्रसिद्ध त्योहार में एक है। यह पर्व हमारी धार्मिक संस्कृति और रीति रिवाज से सालों से जुड़ा है। हरेला शब्द का तात्पर्य हालांकि से हरियाली से है। अब उत्तराखंड में हरेला पर्व के दिन सरकारी, गैर सरकारी विभाग भी शीतकालीन पौधों का रोपण कार्यक्रम का शुभारंभ करते हैं।
हरेला पर्व उत्तराखंड का लोकपर्व है। उत्तराखंड में साल में तीन बार हरेला बोया जाता है। अधिकांश लोग सावन माह के हरेला को अधिक महत्व देते है। सावन माह लगने से पूर्व नौ दिन पूर्व विभिन्न अनाज एक टोकरी या फिर लकड़ी के तख्त में उत्तराखंड के लोग अपने ईष्ट देव के मंदिर में बुवाई करते है। नौ दिन तक उसकी गुड़ाई करते है। 10 वें दिन पाठ पूजा करते बाद हरेला काट कर देवताओं को चढ़ाते है। एक दूसरे को हरेला चढ़ाते समय जी रया ,जाग रया, यो दिन बार, भेटने रया, दुबक जस जड़ हैजो, पात जस पौल हैजो स्यालक जस त्राण हैजो, हिमालय में हाू छन तक, गंगा में पाणी छन तक, हरेला त्यार मनाते रया, जी रया जागी रया, कुमाऊंनी लोकगीत गाते हैं।
इतिहासविद् और संस्कृत के विद्वान गढ़सेर गांव निवासी गोपाल दत्त पाठक ने बताया कि हरेला पर्व पर्यावरण सरंक्षण का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि उत्तराखंड का 70 फीसदी भू भाग में वन है। फिर यहां के लोग पर्यावरण संरक्षण के प्रति काफी सजग है। वन रेंजर बैजनाथ सुरेंद्र सिंह नेगी ने बताया कि बीते 20 सालों में आरक्षित और अनारक्षित भूमि में पेड़ पौधों की संख्या में अच्छी बढ़ोत्तरी हुई है। पर्यावरण संरक्षण क्षेत्र में सालों से काम कर रहे सदन मिश्रा ने बताया कि हरेला पर्व के दिन रोपे गए अधिकांश पेड़ जीवित रहते हैं। उन्होंने बताया कि अब हरेला के दिन उत्तराखंड के अधिकांश लोग सामूहिक रूप से पौध रोपते हैं।