बागेश्वर। प्रदेश की पैरालंपिक खिलाड़ी मोहनी कोरंगा के हौसले के आगे दिव्यांगता भी पस्त है। मोहनी राष्ट्रीय पैरालंपिक खेलों में दो बार भाला और गोला फेंक में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं। राज्य स्तर पर भी मोहनी अपनी झोली में गोल्ड मेडल डाल चुकी हैं। स्वास्थ्य विभाग में बतौर कार्यालय सहायक मोहनी दिव्यांगों की काउंसिलिंग कर उन्हें स्वरोजगार के लिए प्रेरित करती हैं।
1985 में कपकोट के नौकोड़ी में जन्मी मोहनी कोरंगा के बांए पैर 10 साल की उम्र में चोट लग गई। उनके कूल्हे की हड्डी टूट गई। चलने-फिरने में असमर्थ हो गई। विभिन्न अस्पतालों में उनके पैर के 15 बार ऑपरेशन किए गए। इलाज के बाद वह बैसाखी के सहारे चलनी लगीं। बैसाखी के भरोसे हुई मोहनी ने हौसला नहीं खोया। पैरालंपिक खेलों में प्रतिभाग करना शुरू कर दिया।
वर्ष 2017 और 2018 में उन्होंने राज्य स्तर पर बेहतर प्रदर्शन कर भाला और गोला क्षेपण में स्वर्ण पदक जीता। राष्ट्रीय स्तर पर भी इन दो खेलों में स्वर्ण पदक अपनी झोली में डाला। वर्ष 2019 में उन्होंने गोला और भाला क्षेपण में राज्य स्तर पर पैरालंपिक में स्वर्ण पदक हासिल किया।
मोहनी वर्ष 2019 से स्वास्थ्य विभाग में बतौर कार्यालय सहायक कार्य कर रही हैं। वह दिव्यांगों की काउंसिलिंग कर उन्हें हुनरमंद बनाने के लिए प्रेरित करती हैं। अब भी पैरालंपिक खेलों में प्रतिभाग करती रहती हैं।
आज देहरादून में होंगी सम्मानित
बागेश्वर। राष्ट्रीय पैरालंपिक खिलाड़ी मोहनी कोरंगा को विश्व दिव्यांग दिवस पर आज को उत्तराखंड पैरालंपिक एसोसिएशन वर्ष 2021 में उडुपी कर्नाटक में हुई राष्ट्रीय सिटिंग वॉलीबॉल चैंपियनशिप में प्रतिभाग करने के लिए देहरादून में सम्मानित करेगी। मोहनी पुरस्कार समारोह में प्रतिभाग के लिए देहरादून रवाना हो गई हैं। संवाद