बागेश्वर। उत्तरायणी मेले में जोहार (मुनस्यारी) और व्यास-दारमा (धारचूला) के ऊन कारोबारियों के उत्पादों को पहले हाथोंहाथ लिया जाता था लेकिन आधुनिकता की मार इस उद्योग पर भी पड़ी है। इस बार के मेले में दन-कालीन और ऊन से बने अन्य उत्पादों की काफी कम बिक्री होने से उद्यमी निराश दिखे। जड़ी-बूटी के कारोबारियों के हाथ भी निराशा ही लगी है।
उत्तरायणी मेले में दशकों से धारचूला, मुनस्यारी के हस्तशिल्पी ऊन से बने उत्पाद लेकर पहुंचते हैं। इस बार भी मेले में उद्यमी ऊन से बने दन, चुटका, कालीन, थुलमा, पंखी आदि लेकर पहुंचे थे। ऊनी उत्पाद लेकर पहुंचे व्यापारियों का कहना है कि वे लोग दो से तीन लाख रुपये का सामान बिक्री के लिए मेले में लाए थे। पिछले छह दिनों में 10-15 हजार का भी सामान नहीं बिक पाया है। व्यापारी भी मानते हैं कि ऊनी उत्पादों पर मशीनों से बने उत्पादों की मार पड़ी है। सस्ते के चक्कर में हाथ से बने उत्पाद कम बिक रहे हैं। संवाद
अब कम बिकते दन-कालीन
बागेश्वर। नानासैम सरमोली (मुनस्यारी) निवासी 73 वर्षीय व्यापारी किशन सिंह बताते हैं कि वे लोग पिछले 32 साल से उत्तरायणी मेले में आ रहे हैं। पहले तिब्बत से सामान लेकर आते थे। 30 साल पहले 250 से 2500 रुपये तक में दन-कालीन बिकती थी। आज दन-कालीन की कीमत 5000 से लेकर 20,000 तक है। अब काफी कम दन-कालीन बिकती है।
एक भी दन नहीं बिका
बागेश्वर। मुनस्यारी के मल्ला घोरपट्टा निवासी 70 वर्षीय कमला देवी बताती हैं कि वह बचपन से दन बनाने का काम करती हैं। एक दन बनाने में 15 दिन से दो महीने का समय लगता है। दस साल पहले तक उत्तरायणी मेले में अच्छी बिक्री होती थी, लेकिन इस बार अब तक एक भी दन नहीं बिका। निगालपानी धारचूला निवासी 75 वर्षीय गोपाल सोनाल ने बताया कि वह पिछले 38 साल से उत्तरायणी मेले में जंबू, गंदरैणी और अन्य जड़ी बूटियां लेकर आ रहे हैं। तब से मेले में बहुत बदलाव देखे, लेकिन कभी घाटा नहीं हुआ। इस बार के मेले में व्यापार बहुत ही मंदा रहा। अब जड़ी-बूटी के खरीदार भी काफी कम रह गए हैं। संवाद