जंगली जानवरों से खेती बचाने की चुनौती के बीच किसानों के लिए काली हल्दी में उम्मीदों का नया रंग नजर आया है। काफलीगैर के पालड़ीछीना में पहली बार इसकी खेती उत्साहजनक रही है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि सामान्य पीली हल्दी से अलग इसकी फसल उत्पादकों का नुकसान कम करने और आमदनी बढ़ाने में मददगार हो सकती है।
प्रगतिशील किसान सुंदर सिंह जनौटी ने करीब 20 से 25 किलो काली हल्दी के बीज से इसकी शुरुआत की। उनके मुताबिक, क्षेत्र की जलवायु इस फसल के अनुकूल है और इसकी खेती सामान्य हल्दी की तरह आसानी से की जा रही है। खेती में वन्यजीवों और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण लगातार नुकसान झेल रहे किसानों के लिए यह एक विकल्प बन सकता है।
औषधीय, कॉस्मेटिक उत्पादों और वैज्ञानिक शोध में उपयोग होने वाली काली हल्दी की बाजार में मांग है। दिल्ली के खारी बावली जैसे बड़े बाजारों में इसकी गुणवत्ता के आधार पर 500 से 900 रुपये प्रति किलो तक भाव मिलने की उम्मीद है। हालांकि किसानों को वास्तविक लाभ उत्पादन, गुणवत्ता और बाजार तक पहुंच पर निर्भर करेगा।
जनौटी ने काली हल्दी के बीज कृषि विभाग और स्वयंसेवी संगठनों को भी उपलब्ध कराए हैं ताकि दूसरे किसान भी इसकी खेती का प्रयोग कर सकें। क्षेत्र में इसका उत्पादन बढ़ने पर किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ एक नया विकल्प मिल सकता है।
.जंगली जानवरों और भौगोलिक परिस्थितियों के कारण खेती में लगातार नुकसान हो रहा था। इससे निपटने के लिए मैंने प्रयोग के तौर पर 20-25 किलो काली हल्दी से शुरुआत की। यहां की जलवायु इसके अनुकूल है और अच्छी उपज मिल रही है। दूसरे किसानों को जोड़ने के लिए इसके बीज कृषि विभाग और एनजीओ को भी दिए हैं। -सुंदर सिंह जनौटी, प्रगतिशील किसान, काफलीगैर
काली हल्दी एक औषधीय पौधा है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट और सूजन-रोधी गुण पाए जाते हैं। आयुर्वेद में इसका उपयोग विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं के लिए किया जाता है। जिले में इसका उत्पादन स्थानीय आर्थिकी के लिहाज से भी अच्छी पहल है। -डॉ. ऐजल पटेल, वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्साधिकारी